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जनवरी में कहीं से कुबेर का खजाना ले आयेगी सरकार?

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कालाधन पकड़ने के बहाने खस्ताहाल बैंकों को राहत देने के लिए आम आदमी की जेब का पैसा निकलवाकर प्रधानमंत्री ने जो कदम उठाया है उससे न तो देश की बैंकों की समस्या हल होगी और न ही कालेधन और भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जा सकेगी।

एक माह से नोटबंदी के कारण उद्योग, व्यापार और कृषि सहित सभी क्षेत्रों का काम ठप होता जा रहा है। इन सभी क्षेत्रों का बुरा हाल है। सरकार ने तीस दिसंबर तक का समय सुधार करने को मांगा था जबकि जैसे-जैसे समय गुजर रहा है वैसे ही वैसे हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र की सरकारी बैंक प्रथमा बैंक की शाखाओं में दो-दो हफ्तों तक भी पैसा नहीं पहुंच रहा।

लोगों का सरकार और उसकी बैंकों से भरोसा खत्म हो रहा है। यही कारण है कि जो भी पैसा बैंकों से निकाला जा रहा है। वह घूमकर वापस बैंकों तक नहीं आ रहा। पहले यह चक्र जारी था। नोटबंदी के दौरान लोगों का पहले से जमा धन भी जरुरत पर न मिलने से, उन्होंने अब फिर से उसे बैंकों में जमा करना बंद कर दिया है। वे समझ गये हैं कि जरुरत पर जब पैसा वापस नहीं मिलता तो उसे बैंक में क्यों डाला जाये। आपत्तिकाल में काम आने के लिए एक-एक पैसा जुटाकर खून-पसीने की कमाई से वर्षों में जो राशि किसी तरह बड़ी जरुरत के लिए जमा की थी, वह गंभीर बीमारी या औलाद की शादी में जरुरत पर भी नहीं मिल सकी, तो ऐसी बैंक का क्या फायदा? सरकार ने सभी का धन काला मानकर बैंकों में रोक कर न्याय का गला दबाया है। सरकार और बैंकों से लोगों का विश्वास खत्म होता जा रहा है। बैंकों में जमा पैसा कहां गया? यह तो बैंक अधिकारी या सरकार ही बेहतर जानती है।

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पहले कहा गया पुराने नोट बैंकों से बदल लें। नोट बदलने के बहाने जब्त कर लिये गये। कहा गया छपायी चल रही है। जल्दी ही समस्या हल हो जायेगी। अब प्रचार हो रहा कि कैशलैस इंडिया बनाया जायेगा। मंत्री अर्जुन मेघवाल बयान दे रहे हैं प्लास्टिक करेंसी जारी होगी। फिर कहा जा रहा है केवल दस के नोट ही प्लास्टिक के होंगे। बार-बार बयान और गाइडलाइन बदलना ही सिद्ध करता है कि सरकार आर्थिक मोरचे पर दिशाहीन है, वह रास्ता भटक गयी है।

लोग पहले भरोसा कर साहस जुटा रहे थे लेकिन हालात सुधरने के बजाय खराब होने और आयेदिन सरकार द्वारा नये-नये बयान और अंर्तविरोधी नियम बनाने से लोगों में यह धारणा बलवती होती जा रही है कि सरकार की मंशा ठीक नहीं है। वह जनता को धोखे में रख रही है। पहले से नोटों की तैयारी के लिए गोपनीयता भी एक बहाना है। विपक्षी दलों द्वारा नोटबंदी पर नाराजगी जताने पर सरकार द्वारा उनपर कालाधन रखने का आरोप मंढकर उनके सुर दबाने का प्रयास किया गया था। जबकि जनता जानती है कि सबसे अधिक कालाधन सत्तापक्ष के नेताओं के पास होता है। वह चाहें कांग्रेस, भाजपा, सपा या बसपा आदि किसी भी दल के नेता क्यों न हों।

अब तो नौकरीपेशा लोगों को वेतन के भी लाले पड़ गये। पेंशनर तक अपनी पेंशन नहीं निकाल पा रहे। वेतन पाने वालों का धन तो कर-प्रणाली के अंतर्गत ही बैंकों में आता है। उसमें से एक भी पैसा गैरकानूनी ढंग से बैंक से नहीं निकल सकता। फिर उन्हें मिलने वाले वेतन को क्यों रोका जा रहा है? सरकार मुद्रा संकट में फंस चुकी (अपनी गलतियों से) उसके पास नौकरपेशा लोगों को वेतन देने को भी पैसे की कमी पड़ रही है। आखिर कौनसा हथियार बाकी है जो नया साल आते ही सरकार के पास पिछला और अगला दोनों भुगतान करने के लिए धन आ जायेगा?

-जी.एस.चाहल.


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