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नोटबंदी ने कृषि क्षेत्र की रीढ़ तोड़ दी

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नोटबंदी लागू होने का सबसे बड़ा प्रभाव ग्रामीण बैंकों के उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। कैश उपलब्ध कराने में इन बैंकों के साथ भेदभाव बरता जा रहा है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने तथा ग्रामांचलों में बैंकिंग सेवा उपलब्ध कराने के लिए तत्कालीन भारत सरकार ने प्रथमा बैंक के नाम से 2 अक्टूबर, 1975 में पहली ग्रामीण बैंक की स्थापना कर उसका मुख्यालय मुरादाबाद में बनाया था। जिले भर में कई गांवों में उसकी शाखायें खोली गयीं। धीरे-धीरे उनकी बेहतर सेवाओं के कारण उनकी संख्या में वृद्धि होती गयी। यह प्रयोग पूरे देश में किया गया जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था ने गति पकड़ी।

गांवों के अधिकांश लोगों के खाते इन्हीं बैंकों में हैं। जबकि शहरी बैंकों को पैसा लगातार देकर इन बैंकों में कई-कई दिनों तक पैसा नहीं आ रहा। आता भी है तो बहुत कम।

किसानों का कहना है कि सरकार उनसे भेदभाव कर रही है। इससे कृषि क्षेत्र पर बहुत विपरीत असर पड़ रहा है जिससे लोग बहुत जरुरी काम भी नहीं कर पा रहे। बाजार की ओर जाने की हालत भी नहीं। इससे व्यापारी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। दूसरी ओर व्यापारियों का माल न बिकने से उद्योगों का माल भी नहीं बिक रहा। कृषि उत्पादन घट रहा है तथा अगली फसल में भी घाटा होगा। इससे पूरा कृषि क्षेत्र पिछड़ जायेगा। मजदूर खाली हैं तथा व्यापार और उद्योग भी गिरावट के शिकार हैं।

बड़े शहरों में बैठे सत्ताधारी नेता, उनकी वकालत करने वाले मीडिया चैनल खराब होती देश की अर्थव्यवस्था को सुधार की ओर कहकर खुशफहमी पाल रहे हैं। इससे नया साल नयी आर्थिक मुसीबत लेकर आयेगा तभी ये लोग जागेंगे।

-टाइम्स न्यूज़ ब्यूरो.


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