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नोटबंदी से नाराज किसान कर्ज माफी से मान सकते हैं

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नाराज किसान भाजपा को उद्योगपतियों की सरकार करार देकर यूपी में सत्ता तक नहीं जाने देगा.


केन्द्र की एनडीए सरकार के ढाई वर्ष के कार्यकाल में ग्रामीणों विशेषकर किसानों की हालत बद से बदतर हुई है। इसका प्रमुख कारण केन्द्र सरकार द्वारा कृषि और किसानों की घोर उपेक्षा रही है। बार-बार देश के विकास और उद्योगों के उत्थान की बात होती रही है लेकिन किसानों को केन्द्र सरकार और उसके प्रधानमंत्री ने इन ढाई वर्षों में केवल दो बार याद किया है।

पहली बार केन्द्र में सरकार बनने से पूर्व जब उनके वोटों की जरुरत थी।

दूसरी बार फिर किसान, गांव और गरीबों की अब याद आनी शुरु हुई है जब सबसे अधिक विधानसभा सीटों वाले सूबे उत्तर प्रदेश में चुनाव सिर पर हैं।

8 नवंबर को नोट बंदी से तीन दिन पूर्व 5 नवंबर को केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सरकारी बैंकों के अधिकारियों की एक बैठक में जोर देकर कहा था कि कारपोरेट को अधिक कर्ज दिया जाये। बैंक प्रबंधकों ने वित्तमंत्री से कहा था कि बड़े औद्योगिक घराने पुराना कर्जा नहीं दे रहे जबकि उन्हें कई-कई बार कर्जा दिया जा चुका। इससे बैंकों का पैसा खत्म हो गया और कई बैंक घाटे में चले गये हैं।

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वित्तमंत्री ने कहा कि एफडीआई और घरेलू निवेश पूरी कोशिश के बाद भी आशाओं के अनुरुप सफल नहीं हुए अतः वित्तीय संकट गहराता जा रहा है। जिसके समाधान की कोशिश हो रही है।

इस बैठक के विचार विमर्श से ही समझदार लोग समझ गये थे कि देश की आर्थिक हालत खतरनाक दौर में है। पिछले एक वर्ष में ही बैंकों को खतरे से उबारने में दो बार करोड़ों रुपये सरकार द्वारा देने के बावजूद बैंकों की हालत बद से बदतर होती गयी।

वास्तव में खस्ता हाल सरकारी बैंकों को संकट से उबारने के लिए ही सरकार ने आननफानन में नोट बंदी का एलान किया। जिसके दुष्परिणाम लोगों तथा देश को भुगतने पड़ रहे हैं। इससे लोगों के सब्र का बांध टूट रहा है तथा जो लोग शुरु में इस व्यवस्था को दबे मन से ही अच्छा कदम करार दे रहे थे, अब खुलकर आलोचना पर उतर आये हैं।

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डेढ़ माह होने को आया और हालात पहले से बेहतर होने के बजाय और बदतर हुए हैं तो जनता में बेचैनी और सरकार से नाराजगी स्वाभाविक है। इतने लंबे समय तक जरुरतमंदों को उनका पैसा न मिलना एक बड़ा अन्याय है।

इसी के साथ यह भी संदेह में रखा जाना कि पता नहीं आगे कबतक यह स्थिति बनी रहे, लोगों के लिए एक बड़ी मुसीबत है।

लोगों की इस नाराजगी को संघ और भाजपा के जो भक्त नकार रहे थे अब समझने लगे हैं कि वास्तव में लोगों के सब्र का बांध टूटता जा रहा है जिसका खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है तो मंथन शुरु हो गया है और इस विपत्ति से बचने तथा चुनावी नुकसान रोकने की तैयारी शुरु हो गयी है।

सबसे बड़ी चुनौती भाजपा से टूटते भरोसे को रोकने की है। इसके लिए लोगों के बीच कार्यकर्ताओं को भेजने की तैयारी हो रही है।

भाजपा विरोधी तत्वों को बैठे-बिठाये भाजपा के खिलाफ मुफ्त में एक हथियार मिल गया है। पहले से परेशान किसानों की परेशानी नोटबंदी से बढ़ी है जिसे आधार बनाकर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने किसानों के कर्ज माफ करने की सरकार से मांग शुरु कर दी है।

उनका कहना है कि दो हजार आठ में कांग्रेस ने किसानों के कर्ज माफ करके उन्हें राहत पहुंचायी थी, आज किसान तब से बुरे हाल में है, इसलिए किसानों का कर्ज माफ किया जाना चाहिए। भाजपा किसानों को दिवास्वप्न दिखाकर फिर एक बार उनके वोट हासिल करने के प्रयास में है। यदि वह उनको कर्ज माफी में पूरी नहीं तो आंशिक राहत भी देती है तो उसे किसानों का साथ मिल सकता है अन्यथा नाराज किसान भाजपा को उद्योगपतियों की सरकार करार देकर उत्तर प्रदेश में सत्ता तक नहीं जाने देगा।

-जी.एस. चाहल.


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