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गांवों में बसे लोगों को दो माह होने को आये, पैसे-पैसे को तरसना पड़ रहा है.


ग्रामीण बैंकों को कांग्रेस सरकार ने बड़े पैमाने पर किसानों, फुटकर विक्रेताओं तथा मजदूरों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में खुलवाया था। यह बड़ा कदम इंदिरा गांधी ने तत्कालीन आरबीआई गर्वनर डा. मनमोहन सिंह की सलाह से उठाया था।

1975 में देश की पहली ग्रामीण बैंक प्रथमा बैंक मुरादाबाद जिले के गांवों में खोली गयी। जिसे बाद में पूरे देश में लागू किया गया था। इससे ग्रामीण भारत की तस्वीर बदली थी।

गांव, गरीब और किसान-मजदूर का मसीहा होने के थोथे नारे लगाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी के बाद से इस ग्रामीण उत्थान की रीढ़ को ही तोड़कर रख दिया। ग्रामीण बैंकों में एक से दो सप्ताह तक भी लोगों को उनका अपना पैसा नहीं मिल रहा।

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एक सप्ताह बाद भी हसनपुर के जयतौली गांव की प्रथमा बैंक से जब लोगों को कैश नहीं होने की बात कहकर वापस जाने को कहा गया तो उन्होंने प्रबंधक को ही पकड़ लिया और उससे हाथापाई करने लगे। मैनेजर शाखा बंद कर चला गया। यह हालत एक प्रथमा बैंक की नहीं है बल्कि सभी ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित बैंक शाखाओं की है। केवल बड़े शहरों तक ही कैश भेजा जा रहा है।

गांवों में बसे लोगों को दो माह होने को आये, पैसे-पैसे को तरसना पड़ रहा है। ऐसे में भला गांव वालों को भाजपा और उसके नेताओं पर बेहद गुस्सा है। इस समय वे मजबूर हैं। झगड़ा कर वे पैसे नहीं ले सकते बल्कि उन्हें कानूनी दंड और भुगतना पड़ेाग।

वे खामोश हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि चुनाव निकट हैं, इसलिए मतदान के हथियार का प्रयोग समय आते ही उनके खिलाफ करेंगे, जिन्होंने उनके साथ विश्वासघात किया है।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.


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