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अब औद्योगिक कर्मचारियों में भी चिंता,सरकार की मंशा पर शंका

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नोटबंदी का प्रभाव एक माह बीतने पर यहां के औद्योगिक क्षेत्र, व्यापार और होटल व्यवसाय पर स्पष्ट दिखाई देने लगा है।


लोगों के व्यवहार में भी अब तब्दीली दिखाई दे रही है। जो लोग इससे पूर्व इस कदम को अच्छा काम कह रहे थे, उन्हें इस समय इसपर शंका होने लगी है बल्कि अधिकांश लोग खुलकर इस कदम की आलोचना पर उतर आये हैं।

औद्योगिक प्रतिष्ठानों में सेवारत कर्मचारियों को अधिक तक पांच हजार तथा किसी-किसी ब्रांच में मात्र दो या ढाई हजार ही मिले हैं। जुबिलेंट लाइफ साइंसेज लि. के एचआर विभाग में मैनेजर मनोज शर्मा ने बताया कि उन्हें पंक्तिबद्ध होने के बावजूद मात्र ढाई हजार ही मिले। उनकी पत्नि अध्यापिका हैं। उन्हें भी वे ढाई हजार मिलने की बात कह रहे हैं। लेकिन उन्होंने पीएम मोदी के इस कदम की सराहना की।

उधर टेवा एपीआई के कई कर्मचारी कहते हैं कि उन्हें पांच हजार रुपये ही मिले हैं। जिसमें तीन हजार मकान किराये में ही चले गये। बच्चों की फीस और घर का खर्च कैसे चलेगा। यह बड़ा सवाल उनके पास है। एक कर्मचारी का कहना है कि वह दो दिन लाइन में लगा और दो हजार का एक नोट उसे मिला। दो दिन की छुट्टी लेनी पड़ी, कंपनी प्रबंधकों का कहना है कि एक दिन से अधिक रुकोगे तो तनख्वाह कटेगी। वह सवाल करता है जब दो-दो दिन में दो हजार मिलेंगे तो पूरा महीना बैंक में पैसे लेने में ही निकल जायेगा। अगले महीने तो इस तरह एक भी पैसा नहीं मिलेगा। जब काम की बजाय महीने भर वेतन के लिए लाइन लगेगी तो और क्या होगा?

नकदी संकट से पूरा बाजार एक अज्ञात सन्नाटे में है। दुकानदार हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। डेयरी उत्पाद बेचने वाले एक युवक ने थाना चौक पर एक वर्ष खोली दुकान बंद कर दी। वह किराया भी नहीं दे सका। इसी तरह कई दुकानदार संकट में फंस गये हैं।

नवंबर, दिसंबर में चहल-पहल से भरे बाजार में ग्राहकों के दर्शन दुर्लभ हैं। कुछ लोग पीएम पर विश्वास कर तीस दिसंबर की प्रतीक्षा में हैं जबकि अधिकांश का धैर्य जबाव दे चुका और वे पेट पकड़कर नोटबंद करने वाली सरकार को कोस रहे हैं।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.


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