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नकदी संकट के कारण अन्न संकट से भी जूझेगा देश

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गांव, गरीब और किसानों की भलाई का नारा लगाया जा रहा है जबकि नोटबंदी का सबसे बुरा असर इन्हीं वर्गों पर पड़ रहा है.

केन्द्र सरकार और उसके मुखिया नरेन्द्र मोदी कुछ भी दावा करें लेकिन मौजूदा हालात स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि देश आर्थिक संकट के सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। सेवा, कृषि, व्यापार और औद्योगिक प्रतिष्ठान नोट बंदी से बुरी तरह संकट में फंस गये हैं। कालेधन को बाहर करने और नकली नोटों से निजात पाने का शोर मचाकर उठाया गया यह कदम अपने उद्देश्य से भटक गया है। पचास दिन का समय प्रधानमंत्री ने स्वयं मांगा था जिसका आधा समय गुजरने पर ही जनता में हा-हाकार है। इसकी गूंज स्थानीय समाचार पत्रों में सुनाई दे रही है। सरकार के मंत्री सबकुछ जानते हुए भी टीवी कैमरों के सामने इस कदम की सराहना कर रहे हैं।

गांव, गरीब और किसानों की भलाई का नारा लगाया जा रहा है जबकि इसका सबसे बुरा असर इन्हीं वर्गों पर पड़ रहा है। अगले साल के लिए एक बड़ा संकट समझदार लोगों को दिखाई दे रहा है जिसकी चर्चा तक नहीं हो रही। इस बार छोटा किसान जिसकी संख्या कुल किसानों की 80 फीसदी है, गन्ने के खेत गेंहू बोने को खाली नहीं कर पा रहा। ऐसे किसान सीमित भूमि के मालिक हैं, जो गन्ना काटकर गेहूं और गेंहू काटकर गन्ना उगाते हैं। ये समय पर गेंहू बोने को क्रेशर-कोल्हू पर नकद में गन्ना बेचकर खेत भी खाली कर लेते हैं तथा गेंहू भी बो लेते हैं। दूसरे जरुरी खर्च भी चलाते हैं। लेकिन नकदी संकट के कारण क्रेशर आदि पर भी गन्ना नहीं बिक पा रहा। मिलों की पर्चियां बड़े किसानों को मिल रही हैं तथा लोगों को संदेह है कि इस बार मिलों से भुगतान होगा भी या नहीं। नवंबर खत्म हो गया है और खेत खाली नहीं हुए, लिहाजा गेंहू का रकबा घटेगा जिससे उत्पादन गिरना स्वभाविक है। गेंहू चौदह सौ से 24सौ पर पहुंच गया। फसल में आगे उत्पादन कम होने से क्या हालात होंगे, इसका आकलन करना आसान है। देश अन्न संकट से जूझने को भी मजबूर होगा।

फल सब्जियां पहले ही मंडियों तक नहीं जा रहे। जिससे कई जगह उन्हें फेंका जा रहा है। उपभोक्ता खरीदने की क्षमता गंवा चुका। इसलिए उत्पादन बेकार जा रहा है। नकदी संकट आगे कब तक रहेगा यह नहीं कहा जा सकता। तेज आर्थिक रफ्तार के ढोल पीटने वालों ने अचानक पूरे देश के विकास पर ब्रेक लगाकर जनता से भरोसा खत्म कर लिया है।

-जी.एस. चाहल.


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