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नोटबंदी ने पलट दिये उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरण

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नोट बंदी का कदम उठाकर उत्तर प्रदेश में विजय की ओर बढ़ रही भाजपा ने जानबूझकर अपनी पराजय का मार्ग खोल दिया है. भाजपा की इस कमजोरी का लाभ किसे मिलेगा?

नोट बदलने के बहाने सरकार द्वारा की गयी नोट बंदी का असर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के चुनाव पर क्या पड़ेगा? इस सवाल का जबाव लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं। राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोग इसे गहरी उत्सुकता से समझने की कोशिश में जुटे हैं। छोटे शहरों, कस्बों और देहात के लोगों के संपर्क में रहने वाले लोग इस बारे में बहुत कुछ समझ गये हैं तथा जो नहीं समझे नये साल के आगाज तक उनकी अक्ल से भी पर्दा हट जायेगा। तब वे भी प्रत्यक्ष देख सकेंगे। टीवी चैनल दिल्ली, चंडीगढ़, गुडगांव, मुंबई, लखनऊ में कैमरे घुमाकर हकीकत को झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं। भारी भरकम सरकारी विज्ञापनों के बल पर ढाई साल से अंधाधुंध धन बटोरने वाला यह मीडिया निहित स्वार्थों के वशीभूत देश को गड्ढे में धकेलने वालों के हाथ का खिलौना बन चुका है। जब हालात काबू से बाहर होंगे तक ये भी नहीं बच पायेंगे।

देश को आर्थिक संकट में डालने वाले खून पसीने की जनता की कमाई को बैंकों से नहीं निकलने दे रहे। बड़े पूंजीपतियों और उद्योगपतियों को सरकारी बैंकों में जमा जनता के धन को बांट दिया, एक बड़ा हिस्सा केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री की तारीफ करने वालों को दे दिया गया। नौकरीपेशा लोगों को वेतन और पेंशनधारक बैंकों से खाली हाथ लौट रहे हैं। कृषि, व्यापार और उद्योगों की स्थिति खराब होती जा रही है। देश अन्न संकट का सामना करने की ओर धकेला जा रहा है। जैसाकि स्वयं पीएम ने कहा है कि पचास दिन कठिनाई के हैं। जब अभी से आम आदमी का दम निकलने को तैयार है तो पचास दिनों में क्या हालत होगी? समझ में आना चाहिए।

थोथी दलीलों और परीलोक कथाओं से समस्यायें हल नहीं होतीं। केन्द्र सरकार इसी आधार पर चल रही है। चुनाव पूर्व दिखाये हसीन सपने अब शेखचिल्ली की कथाओं के रुप में सामने आने लगे जिन्हें हसीन हकीकत में तब्दील करने की थोथी दलीलें दी जा रही हैं।

बैंकों से अपना पैसा लेने को लाइनों में खड़े लोगों को कहा जा रहा है कि कालेधन वाले अब लाइनों में खड़े होने को मजबूर हैं।

गांवों की हालत पर टीवी कैमरे भी फोकस नहीं कर रहे। गांवों की बैंकों को पैसा भी नाम मात्र का दिया जा रहा है। वोट गांवों में हैं तथा नोट शहरों में हैं। आज आम आदमी भाजपा सरकार की इस नीति से बेहद नाराज है। जिसे भाजपा के निचले पायदान पर बैठे कार्यकर्ता समझ रहे हैं, लेकिन कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं। यह भाजपा के अपनों की अपनों के खिलाफ खामोशी है। भाजपा विरोध का यह लावा चुनाव से ठीक पहले जब फूटेगा तभी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को पता चलेगा कि वह जनता के मूड को भांपने में कितना विफल रहा। पहले ही कमजोर आर्थिक हालातों से निपटने को संघर्ष कर रही जनता की कमर नोट बंदी ने बुरी तरह तोड़ कर रख दी। नोट बंदी की मार पूंजीपतियों के बजाय गरीबों पर पड़ रही है।

नोट बंदी का कदम उठाकर उत्तर प्रदेश में विजय की ओर बढ़ रही भाजपा ने जानबूझकर अपनी पराजय का मार्ग खोल दिया है। भाजपा की इस कमजोरी का लाभ किसे मिलेगा? सपा, बसपा या कांग्रेस को, यह इन दलों के रणनीतिक प्रबंधन पर निर्भर करेगा।

-जी.एस. चाहल.


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