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शिशु पोषण को समझें अपनी सामाजिक जिम्मेदारी -डा.राधा

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डॉ. राधा जिंदल ने उपस्थित डाक्टरों को बताया कि मां का दूध उत्कृष्ट आहार होता है.


मानव जीवन के प्रारम्भिक वर्षों के दौरान मानव विकास दर सर्वाधिक होती है और बच्चे की पौषणिक स्थिति निर्धारित करने में स्तनपान एवं पूरक आहार की प्रमुख भूमिका होती है। कई अनुसंधानों के माध्यम से कुपोषण एवं शिशु आहार के बीच के संबंध को भली-भांति सिद्ध किया जा चुका है। हाल ही के वैज्ञानिक साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि प्रति वर्ष पांच से कम आयु वाले बच्चों में से 60% बच्चों की मृत्यु का कारण कुपोषण होता है। इनमें से दो तिहाई से भी अधिक बच्चों की मृत्यु का कारण अनुपयुक्त आहार पद्धतियां हैं और इनकी मृत्यु 1 वर्ष से कम आयु में हो जाती है।

उक्त विचार नगर के बाईपास मार्ग स्थित एक रिसॉर्ट में नेस्ले न्यूट्रीशन इंस्टिट्यूट एवं जिंदल हॉस्पिटल की ओर से डाक्टरों के लिए आयोजित एक सभा में बालरोग विशेषज्ञा डा.राधा जिंदल ने मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए व्यक्त किये।

आंकड़ो के आधार पर उन्होंने बताया कि विश्व भर में केवल 35% शिशुओं को जीवन के प्रथम चार माह के दौरान माँ का दूध प्राप्त होता है और अधिकतर शिशुओं का पूरक आहार बहुत पहले या देर से आरम्भ हो पाता है। जबकि अधिकतर यह पूरक आहार भी पोषाहारीय दृष्टि से अपर्याप्त एवं असुरक्षित होता है। जिससे बच्चा कुपोषण का शिकार भी हो सकता है।

अतः हम सभी डाक्टरों की सामजिक जिम्मेदारी है कि अभिभावकों को उनके शिशु की आयु के अनुसार सही व उपयुक्त पोषणाहार के बारे में जागरूक करें। क्योंकि शैश्विक एवं प्रारंभिक बाल्यावस्था में गलत आहार पद्धतियां हमारे सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए भी एक बड़ा खतरा है।

डॉ.जिंदल ने उपस्थित डाक्टरों को बताया कि मां का दूध उत्कृष्ट आहार होता है। पहले छः माह के दौरान शिशु की सभी पोषणिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। तथापि छः माह की आयु के बाद से शिशु के आकार और उसके कार्यकलापों में वृद्धि हो रही होती है, अतः शिशु के समुचित विकास हेतु केवल मां का दूध पर्याप्त नहीं होता। इस कारण इस आयु में शिशु की पोषाहरीय आवश्यकताओं में काफी वृद्धि हो जाती है। छः महीने की अवस्था के पश्चात् स्तनपान के साथ-साथ पूरक आहार का समयोजन शिशु की सम्पूर्ण वृद्धि और विकास के लिये अत्यन्त आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि पूरक आहार का उद्देश्य मां के दूध की सम्पूर्ति करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि शिशु को पर्याप्त ऊर्जा, प्रोटीन तथा अन्य पोषक तत्व प्राप्त होते रहें, ताकि वह सामान्य रूप से विकसित हो सके। यह आवश्यक है कि दो वर्ष की आयु या उससे अधिक आयु तक स्तनपान को जारी रखा जाए, क्योंकि मां का दूध ऊर्जा, उत्तम गुणवत्ता प्रोटीन तथा अन्य पोषक तत्वों की उपयोगी मात्रा प्रदान करता रहता है। प्रारम्भिक तीन वर्षों में उपयुक्त आहार शैलियां बच्चे की प्रखर बुद्धि और मस्तिष्क विकास के लिये अत्यन्त आवश्यक है।

अपने संबोधन में डॉ.जिंदल ने कहा कि कुपोषण के खिलाफ अगर हम रणनीति के तहत काम करेंगे तो सुखद परिणाम हमारे सामने होगा। बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर अगर उनके परिजन ध्यान रखें तो परेशानियां स्वतः समाप्त होंगी। स्वस्थ बच्चे सक्षम नागरिक बनकर देश के सामजिक एवं आर्थिक विकास में योगदान कर सकते हैं। इसलिए बच्चों का शुरूआती जीवन स्वस्थ एवं कुपोषण रहित होना अत्यंत आवश्यक है।

सरकारी प्रयासों के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि राज्य एवं केंद्र सरकारें इस विषय की गंभीरता को देखते हुए अनेक योजनाओं को लागू कर रही हैं। उत्तर प्रदेश सरकार में कुपोषण से निजात दिलाने के लिए राज्य पोषण मिशन एवं अन्य योजनाओं के माध्यम से करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।

कार्यक्रम का संचालन नेस्ले के न्यूट्रीशन ऑफिसर रंजन झा ने किया। इस कार्यक्रम में डा.एम.पी.शर्मा, डा.बी.एस.जिंदल, डॉ. राजेश सारस्वत, डा.हाजी याकूब अली, डा. दिलबाग जिंदल, डॉ.संदीप आर्य, धर्मपाल आदि उपस्थित थे।

-टाइम्स न्यूज़ मंडी धनौरा.


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