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चुनाव आ गए हैं, फैसला जनता को करना है- किसे चुनना है और किसे बेदखल करना है.


नेताओं की कार्यप्रणाली को उत्तर प्रदेश की जनता ने समझ लिया होगा। अब फैसला उसके हाथ है। सूबे की सत्ता की चाबी अब जनता के हाथ में है। पांच साल के लिए पिछले चुनाव में लोगों ने समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सौंपी थी। उसके कार्यकाल में वह अपने वायदों पर कहां तक खरी उतरी? लोगों को अच्छी तरह पता लग गया होगा।

किसानों, व्यापारियों, मजदूरों तथा बेरोजगारों की समस्याओं को हल करने में सरकार कहां तक सफल रही? दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों का हितसाधन कहां तक हुआ?

कानून व्यवस्था तथा जन सुरक्षा, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी जैसे मामलों का क्या हाल है? लोग अच्छी तरह जान चुके होंगे।

ऊपर दिये सभी मुद्दों पर जहां सरकार जबावदेह है, वहीं विपक्षी दलों की भूमिका कैसी रही? विपक्ष अपनी जबावदेही पर कहां तक खरा उतरा?

इन सभी बातों का आकलन हम सभी को करना होगा।

इसी के साथ यह और भी जरुरी है कि सत्ता पाने के लिए जनता के दरबार में जो उम्मीदवार अब हाजिरी देने आ रहे हैं, उनका लेखा-जोखा और सामाजिक पृष्ठभूमि की पड़ताल भी बहुत जरुरी है। उनकी चाल, चरित्र तथा चेहरा जनता के सामने है।

मतदान से पूर्व इन सभी बातों पर ध्यान दिया जाना जरुरी है।

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पिछले चुनावों में उत्तर प्रदेश में हम लोग जाति-बिरादरी के आधार पर मतदान करते रहे हैं जिसका दुष्परिणाम हम भुगत भी रहे हैं।

हमारी इस आदत से सभी दल और नेता वाकिफ हो चुके हैं। इसी कारण वे जातीय समीकरणों पर ध्यान केन्द्रित कर उम्मीदवार मैदान में लाते हैं।

जात-बिरादरी की इस खेमेबंदी ने सूबे के विकास के सभी दरवाजे बंद कर दिये हैं। इसी बीमारी से कई और रोग फैल गये हैं जिससे हमारा सुख-शांति छिनता जा रहा है, कानून व्यवस्था इसी कारण बद से बदतर होती जा रही है।

हमें फिर एक मौका मिला है, जिससे हमें जाति व संप्रदाय से ऊपर उठकर स्वच्छ छवि तथा ईमानदार नीयत के उम्मीदवारों का साथ देना चाहिए।

अन्यथा फिर पांच साल तक पछताना पड़ेगा।

-जी.एस. चाहल.

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