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चुनाव में जब सभी नापसंद हों..

कोई भी आये वही अपना पेट भरता है तो मतदान करने या न करने से क्या फर्क पड़ता है.


जब भी चुनाव आते हैं तभी हमारे समाज के अग्रणी महानुभाव और चुनाव अधिकारी जोर देने लगते हैं कि सभी मतदाता मतदान करें. कई समाजसेवी तो यहां तक कहते पाये जाते हैं कि वोट न डालना अपराध है. सरकार की ओर से मतदान प्रतिशत बढ़ाने को तरह-तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. कई एनजीओ भी इस काम में लगाये जाते हैं. फिर भी देखने में आया है कि आधे मतदाता भी मतदान केन्द्रों तक नहीं पहुंच पाते. लोकसभा और विधान सभा चुनावों में यही होता है जबकि ग्राम पंचायत चुनावों में मतदान प्रतिशत हमेशा साठ-सत्तर तक बल्कि कुछ स्थानों पर इससे भी अधिक पहुंचता है.

हमारे देश की आजादी को साढ़े छह दशक से अधिक समय बीत चुका. इस अवधि में जनता ने कई दलों और राजनैतिक गठबंधनों को सत्ता सौंप कर देखी लेकिन कोई भी दल लोगों की भावनाओं पर खरा नहीं उतरा. सभी ने मतदाताओं को निराश किया. हमारे समाज को जाति और संप्रदायों में बांटने का प्रयास ही नेताओं ने किया. इससे आधे से अधिक मतदाता सोचते हैं कि कोई भी सत्ता संभाले उनके साथ एक जैसा ही सलूक करेगा. इसलिए वोट डालने की परेशानी क्यों मोल ली जाये. कई स्थानों पर सभी प्रमुख प्रत्याशी ऐसे होते हैं कि जिन्हें अधिकांश मतदाता बिल्कुल भी पसंद नहीं करते. ऐसे में वोट न देने वाले मतदाता ही बेहतर सोच रखते हैं. जो लोग यह दावा करते हैं कि मतदान न करना अपराध या पाप है उनके हिसाब से कोई धूर्त, पाखंडी या चोर उचक्का कोई भी मैदान में हो उसे बागडोर सौंपना अनिवार्य है. ऐसी सोच वाले बुद्धिजीवी और कथित समाज सेवियों ने ही आजाद भारत को बरबाद करने में सहयोग दिया है. समझदार मतदाता जानता है कोई भी आये वही अपना पेट भरता है तो उसके मतदान करने या न करने से क्या फर्क पड़ता है.

हकीकत में जिस व्यक्ति को कुल मतदान का पचास फीसदी मत नहीं मिले उसे पराजित घोषित किया जाना चाहिए. यहां तो दस बारह प्रतिशत वोट हासिल करने वाले भी जीत जाते हैं. जब बहुमत का तरीका है तो कम मत पाने वालों को रद्द कर पुनः चुनाव कराये जाने चाहिए. जनता को नकारात्मक वोट भी डालने का हक मिलना चाहिए. यह दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए कि वोट डालना जरुरी है. मतदाता की इच्छा है, हो सकता है खड़े उम्मीदवारों में से वह किसी को भी पसंद नहीं करता अथवा सबको एक जैसा मानता है. न डाले गये मतों को चुनाव में भाग ले रहे उम्मीदवारों के खिलाफ जनादेश माना जाना चाहिए. तभी दागी नेताओं से जनता को राहत मिलेगी.

-हरमिन्दर सिंह


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