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चुनावों में तीन प्रतिशत मत ही इधर से उधर होते ही सत्ता बदलवाने में सक्षम रहे हैं.


'रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय। 
जोरे से फिर ना जुरै, जुरै गांठ परि जाय।।'

मध्यकालीन इतिहास के कवि रहीम के इस दोहे को नज़ीर मानते हुए कहा जा सकता है कि भले ही सपा पार्टी के नेताओं को एकजुट कर लिया जाये लेकिन यह एकता उसी धागे की तरह होगी, जिसमें टूटकर जोड़ने में गांठ पड़ जाती है। बाप-बेटे में सत्ता की यह उठापटक इस चुनाव में अपना रंग जरुर दिखायेगी।

भले ही समाजवादी कुनबा एकजुट होकर मैदान में उतरे लेकिन कुछ दिनों से कुनबे में मचे घमासान ने निचले स्तर पर इस थोड़े अंतराल ने उसे भारी क्षति पहुंचायी है। सबसे बड़ा बखेड़ा मुलायम और अखिलेश द्वारा जारी अलग-अलग सूचियों से हुआ है। इससे पार्टी में मची खेमेबंदी की जंग और भयंकर हो गयी है। यदि एकता परवान चढ़ी तो यह निश्चित है कि अखिलेश समर्थक मैदान में रहेंगे तथा दूसरे उम्मीदवार या तो मैदान से हट जायेंगे या बागी उम्मीदवार के रुप में मैदान में डटेंगे। इसकी भारी कीमत चुनाव में सपा को चुकानी होगी।

कांग्रेस और रालोद से गठबंधन को लेकर भी चर्चा है। माना जा रहा है, इससे धर्मनिरपेक्ष वोट बंटने से बचेंगे तथा भाजपा के सामने एक मजबूत विकल्प खड़ा होगा। इसका खामियाजा भी सपा को ही भुगतना होगा। सपा के दोनों खेमों द्वारा घोषित उम्मीदवारों को कम से कम 130 सीटों से हटना होगा। यहां कांग्रेस या रालोद के उम्मीदवार आ जायेंगे। इन 130 सीटों पर सपा के दोनों गुटों के 260 प्रत्याशियों में नाराजी उभरना स्वाभाविक है। अगले पांच वर्षों तक ऐसे लोगों को सत्ता में भागीदारी से विलग होने के बजाय किसी दूसरे दल से संबंध बनाकर नये उम्मीदवार को हराना शांति का साधन बनेगा। भाजपा विरोधी ऐसे उम्मीदवार नाम कटने से बसपा का रास्ता चुन सकते हैं।

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पहले बाप-बेटे के युद्ध और बाद में नये गठबंधन के कारण सपा की रीढ़ माने जाने वाले मुस्लिम मतदाताओं में इस समय सबसे बड़ी उथलपुथल है। यह वर्ग प्राथमिकता के आधार पर सपा के साथ था, लेकिन उसके आपसी टकराव से वह संशय में है।

ऐसे में भाजपा को रोकने के लिए वह बसपा की ओर कदम बढ़ा सकता है। वैसे भी जिन स्थानों पर सपा उम्मीदवार कमजोर होगा, वैसे ही इस वर्ग का मतदाता बसपा के पाले में खिसक जाता है।

सपा के आंतरिक झगड़े के बाद राजनैतिक विश्लेषक असली लड़ाई यहां भाजपा और बसपा में मानने लगे हैं। इस चीज को बसपा सुप्रीमो मायावती भी मान रही हैं। वे पहले दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर जोर दे रही थीं लेकिन नोटबंदी के कारण भाजपा के खिलाफ उपजे माहौल से वे सतर्क हो गयीं तथा उन्होंने जातीय आंकड़ों का सामंजस्य बैठाते हुए सभी वर्गों को यथा स्थान उम्मीदवारी सौंपी है। उनका प्रयास सर्वजन समाज के नारे को असली रुप देना है।

भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ना चाहती है। उसके पास इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं है लेकिन यही निर्णय उत्तर प्रदेश में उसके लिए अमंगलकारी भी हो सकता है। भाजपा के परंपरागत वोट माने जाने वाले, व्यापारी वर्ग में नोटबंदी के निर्णय के बाद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति खासी नाराज़गी उभरी है। जिसका पता आरएसएस के नेताओं को भी चल गया है।

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किसान और मजदूर नोटबंदी की मार से और भी प्रभावित हुए हैं। एक बड़ी संख्या जिसने लोकसभा चुनाव में आंख मूंद कर नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा को मतदान किया था, आज भाजपा से असंतुष्ट है। उत्तर प्रदेश के कई भाजपा दिग्गजों जिनमें गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ, वरुण गांधी, राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह आदि को चुनावी भागीदारी से दूर रखना, भाजपा के लिए भीतरघात का बड़ा खतरा बनेगा।

भाजपा के कई बड़े नेता और भी हैं जो उपेक्षा से नाराज हैं। वास्तव में भाजपा जिस तरह बाहर से दिखती है वह यूपी में हकीकत में वैसी नहीं है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह द्वारा थोपे उम्मीदवारों को कार्यकर्ता कहां तक अपनायेंगे? यह बड़ा सवाल है।

बसपा सभी सीटों पर शांतिपूर्वक सबसे पहले अपने उम्मीदवार उतार चुकी। सपा और भाजपा द्वारा देरी से उम्मीदवार उतारने से भी बसपा ही लाभ में रहेगी।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में तीन प्रतिशत मत ही इधर से उधर होते ही सत्ता बदलवाने में सक्षम रहे हैं। सपा के झगड़े से अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं एक बड़ी संख्या टूटनी अवश्यंभावी है। उसका लाभ बसपा को ही अधिक मिलने की आशा है। यदि बसपा ने दलित-मुस्लिम गठजोड़ का नारा जोर से बुलंद किया तो उसका लाभ भाजपा को ही अधिक मिलेगा। इससे बसपा की ओर बढ़ने वाला बहुसंख्यक हिन्दू मतदाता भाजपा की ओर चला जायेगा।

भाजपा भी गंभीरता से हर स्थिति का आकलन कर रही है। वह सपा की फूट का लाभ उठाना चाहती है। जरुरत पड़ने पर उसके साक्षी महाराज जैसे नेता साम्प्रदायिक कार्ड खेलने से भी पीछे नहीं हटेंगे। इस बार का यूपी चुनाव बहुत ही अनिश्चय के गर्भ में है। एक-एक राजनैतिक घटनाक्रम चुनावी गणित को एक नयी दिशा में मोड़ रहा है।

-जी.एस. चाहल.


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