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मंडी धनौरा में जाट भाजपा के साथ, नौगांवा सीट पर जाटों में बिखराव

दोनों विधानसभा सीटों पर सभी दल जाटों को अपने पाले में खींचने को बेताब दिख रहे हैं.


जिले की मंडी धनौरा सीट पर जाट समुदाय का बड़ा हिस्सा सपा को हराने के लिए भाजपा के साथ एकजुट होता जा रहा है जबकि नौगांवा सादात में वह निर्णायक भूमिका में होते हुए बिखराव की ओर बढ़ गया है। दोनों विधानसभा क्षेत्रों में जातिगत आंकड़ों के आधार पर जाट समुदाय निर्णायक भूमिका में है। यही कारण है कि सभी दलों के उम्मीदवार इस समुदाय पर डोरे डाल रहे हैं।

दोनों विधानसभा क्षेत्रों में यह वर्ग सपा के बहुत खिलाफ है तथा स्थिति यह है कि उसे हराने के लिए वह किसी का भी समर्थन कर सकता है। वैसे इस बार आम जाट, सभी दलों द्वारा चौधरी अजीत सिंह से अछूतों जैसा व्यवहार करने के कारण, छोटे चौधरी से सहानुभूति जता रहे हैं लेकिन यहां की चारों सीटों पर रालोद द्वारा कमजोर उम्मीदवार मैदान में लाने से वे उनका समर्थन कर अपने वोट बेकार जाने की आशंका में उससे दूरी ही बना रहे हैं। मंडी धनौरा में सभी दलों द्वारा नकारे व्यक्ति को उम्मीदवार बना कर रालोद यहां हास्य का पात्र ही बनी है। इससे रालोद से जुड़े जो भी लोग थे वे भी इधर-उधर खिसक गये। हालत यह है कि रालोद का कोई भी नेता उसके प्रचार तक में जाने को तैयार नहीं। सपा द्वारा एक वर्ग विशेष का पोषण करने का तमगा हासिल कर किसानों के एक सबसे अहम वर्ग को स्वयं से दूर कर लिया। बसपा नेताओं ने बछरायूं में आधुनिक पशु वधशाला कायम कर तमाम पशु पालकों खासकर जाट समुदाय को अपने खिलाफ कर लिया है। ऐसे में यह वर्ग बसपा की ओर जाने से भी कतरा रहा है। हालांकि बसपा उम्मीदवार रालोद से निकले कुछ लोगों को साथ लेकर यहां सेंधमारी की कोशिश कर रहा है।


ईमानदारी से समीक्षा करने पर यह बात सामने आ रही है कि जाट समुदाय मंडी धनौरा में सपा के पूरी तरह खिलाफ है। बसपा को यहां लगी पशुशाला के कारण वोट नहीं करना चाहता। रालोद उम्मीदवार सबसे कमजोर है। ऐसे में इस समुदाय का झुकाव भाजपा की ओर होता जा रहा है। चुनावों में अनेक कारणों से समीकरणों में उथलपुथल होती रहती है, जो इस बार कुछ ज्यादा ही है। इसलिए अभी मतदान तक देखना होगा कि कौन किसके साथ जाता है? यहां केवल चार उम्मीदवार मैदान में हैं।

नौगांवा सादात विधानसभा
इस सीट पर 13 उम्मीदवार मैदान में हैं। जबकि भाजपा, बसपा, रालोद, सपा और राकिमपा मुख्य मुकाबले में हैं। यहां निर्णायक भूमिका निभाने वाला जाट समुदाय इस बार बंटता नजर आ रहा है। इस समुदाय से मतदाता रालोद, बसपा, भाजपा और राकिमपा में बंट गये हैं। इस विधानसभा सीट पर जाट नेताओं की भारी संख्या के कारण ऐसा हो रहा है। इस आपसी विघटन के कारण ही इस सीट पर जाटों का बोलबाला होने के बावजूद यहां से कोई सर्वमान्य जाट चेहरा उभरकर नहीं आया है। कई लोग इस कोशिश में हैं कि बिरादरी एकजुट होकर अपनी ताकत का अहसास दिलाये। देखना होगा कि इस कोशिश से यहां का जाट एकजुट होगा या नहीं? एकजुट हुआ तो उसका लाभ किसे मिलेगा? वैसे अभी तो एकजुटता का अभाव है। संभावना बसपा या भाजपा की ओर जाने की है।


-टाइम्स न्यूज़ धनौरा/नौगावां.


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