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कैसा चुनाव है, जनता की बात तो कोई कर ही नहीं रहा!

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अमरोहा जिले की चारों विधानसभा सीटों पर पांच साल में कुछ खास बदलाव नहीं आये हैं.


वोटर इस बार भी इधर-उधर देख रहा है। वह हर बार ऐसा करता है। मजदूर और गरीब वोटर हर बार यह सोचता है कि इस बार उसके दिन बदलेंगे। उसे हर बार नये वादे और नये इरादे का डोज दिया जाता है। वह पांच साल के दर्द को भूलकर फिर से झांसे में आ जाता है और हर बार की तरह ठगा जाता है।

अमरोहा जिले की चारों विधानसभा सीटों पर पांच साल में कुछ खास बदलाव नहीं आये हैं। कभी-कभी लगता है, यदि सरकारें न होतीं तो भी लोग अपने स्तर से कुछ कर ही लेते। वही टूटी-फूटी सड़कें, कच्चे रास्ते, बदहाल बिजली व्यवस्था, ठप्प सरकारी मशीनरी बगैरह-बगैरह।

चुनाव का शोर बहुत है। हर गली-चौराहे पर चुनाव की चर्चा गरम है। गर्मी इतनी हो रही है कि जिले में कई जगह खबरें आ रही हैं कि विभिन्न दलों के समर्थकों में जमकर ठनी हुई है। उन्हें आमने-सामने एक-दूसरे की गाड़ियां का रेला भी गवारा नहीं।

मतदान-चुनाव-चिन्ह
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जाति-धर्म के नाम पर चुनाव से पहले बड़ी-बड़ी बातें, और चुनाव के दौरान अधिकतर वोटर उसी बहाव में बहने से खुद को रोक नहीं पाते। उनकी गलती भी नहीं, क्योंकि भाषणों की भाषा बार-बार वही तो दोहरा रही है। चुनाव आयोग की सख्ती तो किसी कोने में सुस्ता रही है।

जागरुक मतदाता सोच रहे हैं कि वे इस बार भी हर बार की तरह उसे वोट करें जो जनता के मुद्दों पर जीतने के बाद अमल कर सके। सबसे कमाल यह है कि ज्यादातर उम्मीदवार धर्म-जाति की बात कर रहे हैं। एक-दूसरे पर आरोप मंढ रहे हैं। दूसरों की गलतियां निकाल रहे हैं। जनता की बात तो कोई कर ही नहीं रहा।

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-हरमिंदर सिंह.


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