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गोद लिया बेटा और प्रियंका पर अमित शाह की चुप्पी, अब प्रवक्ता की तलाश है

प्रियंका-गाँधी-अमित-शाह
मोदी ने जब खुद को यूपी का गोद लिया बेटा बताया तो बयानबाजी ने पुराने रिकार्ड तोड़ डाले


यूपी में बयानों का महत्व रोज बढ़ता जा रहा है। कोई किसी की मजाक उड़ा रहा तो दूसरा अपनी ढोलक बजा रहा है। कहने का मतलब यह है कि एक-दूजे का मखौल उड़ाने की कसम जैसे राजनेताओं ने खा ली है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ताली बजाकर अपने भाषणों में विपक्ष को पानी पीकर कोसने का काम किया था और वे मौका मिलने पर ऐसा कर रहे हैं। फिर विपक्ष पीछे कैसे रहा सकता है। उन्होंने भी पानी पीकर और बिना पिये ही मोदी को कोसा। तर्क दोनों में अपने-अपने तरह से मिलाये गये, चाहें वे तर्क थे भी या नहीं भी।

पीएम मोदी ने जब खुद को यूपी का गोद लिया बेटा बताया तो बयानबाजी ने पुराने रिकार्ड तोड़ डाले। उबाल मानो उबलकर पतीले से बाहर आ गया। लालू यादव ने तो पिताजी का नाम तक पूछने की हिम्मत जुटायी। हालांकि मीडिया ने उन्हें वह पब्लिसिटी नहीं दी जो अरविन्द केजरीवाल को छींकने पर दी जाती है। हालांकि आरोप यह लगाया जाता है कि आप को बदनाम करने की बातें मीडिया पहले कैच करता है।

प्रियंका गांधी ने पीएम मोदी के गोद लिये बयान को भुनाने की कोशिश की। उन्होंने साफ कह दिया कि यूपी को विकास के लिए गोद लिए बेटे की जरुरत नहीं है। फिर शुरु हुआ चुटकुलों का दौर। बयानबाजी चरम पर पहुंच गयी। तीर निशाने पर लगने से रहे, मगर मयान से एक के बाद एक निकल रहे हैं।

अमित शाह ने पत्रकार वार्ता कर डाली। उन्होंने कहा कि प्रियंका गांधी से जुड़े सवालों के जवाब बीजेपी प्रवक्ता देंगे। मीडिया वाले उस प्रवक्ता को ढूंढने में शायद कामयाब दिख रहे हैं जो प्रियंका गांधी के बेटे वाले बयान की जवाब दे सके। मगर उम्मीद जतायी जा रही है बीजेपी में ऐसा प्रवक्ता चुनाव के बाद होली के आसपास गुलाल लगाये हुए मिल जरुर जायेगा।

नरेंद्र-मोदी-की-बात

अमित शाह ने यह भी कहा कि प्रियंका गांधी के बारे में बात करना उनका लेवल नहीं। मतलब साफ था वे उस सवाल का जवाब देने से बच रहे थे जिसका उत्तर वे देते तो भूल भुलैया की तरह फंस सकते थे। एक उत्तर सवाल बनता तो, दूसरा सवाल उत्तर। यह सिलसिला लंबा खिंच सकता था।

अमित शाह ने यह जरुर कह दिया कि यूपी, उत्तराखंड, गोवा में उनकी सरकार बहुमत से आ रही है। मगर वे पंजाब को बोले नहीं। शायद वहां की असली ताकत किसके पास आने वाली है, ये वे वोटिंग के समय ही समझ गये होंगे।

अखिलेश यादव को अमित शाह ने पहले भी अपने बयानों में नहीं बख्शा। इस बार भी बातें वही थीं, भ्रष्टाचार, किसान और महिलाओं की बात, मगर होगा कैसे, इसपर कोई आजतक बोला ही नहीं। मगर चुनाव हैं, चुनाव में यही प्रचार होता है और वह तो जारी है आखिरी वोट डाले जाने तक।

-गजरौला टाइम्स डॉट कॉम.


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