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उत्तर प्रदेश का सियासी समर फिर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर

उत्तर-प्रदेश-चुनाव
टिकटों के बंटवारे में धार्मिक तथा जातीय गणित पर सभी दलों ने उम्मीदवारों को उतारा है.


पूरा देश सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के चुनावी परिणामों की प्रतीक्षा में है। हालांकि अभी चुनावी प्रक्रिया एक माह चलेगी। पहले चरण का मतदान 11 फरवरी तथा सातवें और अंतिम चरण का मतदान 8 मार्च को होगा। मतगणना 11 मार्च को होगी। इसलिए हमें परिणामों के लिए अभी एक माह तक इंतजार करना होगा।

वैसे एक बात स्पष्ट हो गयी है कि भले ही सभी दल बात विकास और धर्मनिरपेक्षता की करें लेकिन स्थिति जानबूझकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की बनायी जा रही है। भाजपा अघोषित रुप से अभी भी हिन्दुत्व की ओर झुक रही है जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा अल्पसंख्यक मुस्लिम मतदाताओं के बल पर सत्ता हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं। किसानों की पार्टी रालोद भी धर्मनिरपेक्षता के बहाने उसी ओर झुकता दिख रहा है।

जिस प्रकार टिकटों के बंटवारे में धार्मिक तथा जातीय मतों के गणित पर सभी दलों ने उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। इस वजह से प्रदेश का विकास कहीं पीछे छूट गया है तथा 2014 के लोकसभा चुनाव की तरह चुनाव साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर चल पड़ा है।

भाजपा द्वारा राज्य के दूसरे सबसे बड़े मुस्लिम समुदाय से किसी भी उम्मीदवार को टिकट न देना तथा सपा-कांग्रेस व बसपा द्वारा इस समुदाय के अनुपात से अधिक उम्मीदवार मैदान में उतारना ही सूबे में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की छवि प्रस्तुत करने को पर्याप्त है।

सपा तथा कांग्रेस का गठबंधन भी इसी कारण हुआ है कि अल्पसंख्यक मतों का विभाजन रोका जा सके तथा उनको गठबंधन अपने पक्ष में करने में सफल हो सके। उधर बसपा भी दलित-मुस्लिम एजेंडे पर आगे बढ़ रही है। बसपा ने कई मुस्लिम संगठनों के नेताओं का समर्थन हासिल करने के लिए उन्हें सपा के दस फीसदी यादव मतों में जुड़ने के बजाय 21 फीसदी दलित मतों के साथ आने की राय दी है। इससे यह आंकड़ा लगभग चालीस फीसदी बैठता है।

मुस्लिम मतदाताओं से जब बात की जाती है तो वे अभी खुलकर बात करने को तैयार नहीं जबकि जानकारों का कहना है कि यह समुदाय भाजपा के पूरी तरह खिलाफ है। अतः सपा-कांग्रेस, बसपा या रालोद में से किसी भी विकल्प का चयन करना चाहता है जो भाजपा पर भारी पड़ता दिखेगा। समुदाय के समझदार लोग इसकी बारीकी से पड़ताल कर रहे हैं कि उन्हें सपा और बसपा में से किसके साथ जाने से लाभ है या इनमें से कौन भारी है।

यह लगभग सुनिश्चित है कि अधिकांश मुस्लिम धार्मिक नेता बसपा के दलित समुदाय के वोट बैंक को भारी मानते हुए सपा से अलग होने का गहरायी से मंथन कर रहे हैं। दिल्ली के शाही इमाम और एक मुस्लिम संगठन के नेता खुलकर बसपा के समर्थन में आ गये हैं।

यह भी संभव है कि मतदान के ऐन वक्त पर इस समुदाय का बहुमत बसपा के पक्ष में आ जाये। यदि ऐसा हुआ तो फिर मुकाबला भाजपा और बसपा में होगा। सपा-कांग्रेस गठबंधन कमजोर पड़ जायेगा। सपा की आपसी उठापटक तथा राहुल गांधी की कमजोर वाकशैली से भी मुस्लिम समुदाय सशंकित है। ऐसे में जिन मुस्लिम मतों के लालच में यह गठबंधन बना है वह पूरा होता नहीं दिखता।

जाहिर यही हो रहा है कि मुस्लिम समुदाय का मूल उद्देश्य यह है कि भाजपा हारे, इसके लिए सपा, बसपा, कांग्रेस या रालोद किसी भी दल का समर्थन करने में उसे कोई आपत्ति नहीं होगी। उधर भाजपा भी समझ गयी है कि बहुसंख्यक वर्ग के मतों के ध्रुवीकरण के सहारे ही वह चुनावी वैतरणी पार कर सकती है।

-जीएस चाहल.


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