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मजदूर की जिंदगी की कीमत चार लाख!

पुलिस हमेशा उद्योपगतियों का पक्ष लेती है. एक मामूली मजदूर से उसे कुछ नहीं लेना देना.

देश के महत्वपूर्ण औद्योगिक नगर गजरौला में स्थापित औद्योगिक इकाईयों में श्रमिक सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। ऐसे में प्रतिवर्ष कई बेकसूर श्रमिकों को जान गंवानी पड़ती है। मामूली दुघर्टनाओं में घायल होने के मामले बहुधा प्रकाश में भी आते रहते हैं लेकिन सब चलता है की तर्ज पर इकाईयां चलाने वालों को मुनाफा कमाने के अलावा, उन्हें अपनी कमाई से मुनाफा कराने वाले श्रमिकों के हितों से कोई सरोकार नहीं।

मजदूर की जिंदगी की कीमत चार लाख!

बीते रविवार में यहां की कौशाम्बी पेपर मिल में जिस मजदूर की मौत हुई, उसकी मौत की वजहों को मिल में काम करने वाले तथा प्रबंधतंत्र अच्छी तरह जानते हैं। ऐसी घटना से फैले आक्रोश पर काबू पाने वाली पुलिस, विशेषकर औद्योगिक क्षेत्र में स्थित पुलिस चौकी का इंचार्ज पूरी तरह वाकिफ होगा। पुलिस हमेशा उद्योपगतियों का पक्ष लेती है। एक मामूली मजदूर से उसे कुछ नहीं लेना देना। यही कारण रहा कि मजदूर के आश्रितों और परिजनों को मात्र चार लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा कर इस मामले को निपटा दिया गया। जबकि वे परिवार के कमाऊ सदस्य की मौत पर दस लाख की सहायता या सांत्वना मांग रहे थे। न्याय की लंबी लड़ाई और वह भी एक उद्योपगति से, वे इसका परिणाम या तो जानते थे या उन्हें समझा दिया गया होगा। सामने मजदूर की मौत पर हमदर्दी का नाटक करने वाले हकीकत में पूंजीपतियों के साथ थे।

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इस तरह की मौतें इन इकाईयों में होना आम बात है। कई घटनायें तो प्रकाश में ही नहीं आतीं। ज्यादातर मजदूर सुदूर इलाकों के होते हैं जिनके बारे में प्रायः पता नहीं चलता। पता चलता भी है तो उनसे हमदर्दी करने वाला भी कोई नहीं होता। लिहाजा इस तरह के मामले प्रबंधन और पुलिस द्वारा नजरअंदाज कर दिये जाते हैं। कौशाम्बी में मरा युवा मजदूर करीब के गांव का था इसलिए मिल प्रशासन पर लोगों का दबाव बन भी गया। यह भी एक वजह है जिसके कारण इन इकाईयों में स्थानीय लोगों को काम देने से प्रबंधक बचते हैं।

कौशाम्बी पेपर मिल में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने से इस तरह की घटनाओं का खतरा बना हुआ है। कई स्थानों पर खतरों के बीच पापी पेट के लिए मजदूर काम करने को मजबूर हैं। सेफ्टी बेल्ट के अभाव में मजदूर ऊपर से नीचे गिरा था। और भी कई सावधानियां हैं जिनका दायित्व प्रबंधन पर है लेकिन वह इस ओर ध्यान ही नहीं दे रहा।

मिल में एक एंबुलेंस तक की व्यवस्था भी नहीं है तथा एक भी आपातकालीन बचाव दस्ता यहां नहीं है। इस इकाई के साथ ही यहां स्थित मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति की जांच की जानी चाहिए। इसके लिए धनौरा के एसडीएम या अमरोहा की डीएम संबंधित विभाग के किसी जांच दस्ते को, जिसमें अग्निशमन विभाग और स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाये, जांच करायें। उसके बाद सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जानी चाहिए। साथ ही संबंधित इकाई को कड़ा संदेश भी दिया जाना चाहिए।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.


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