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किसे मिलेगी यूपी की कमान? अपने-अपने कयास

यूपी चुनाव के जबतक परिणाम नहीं आ जाते कयासों का दौर इसी तरह जारी रहने वाला है.

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावी परिणामों को लेकर काफी अनिश्चितता है फिर भी लोग भाजपा, बसपा और कांग्रेस-सपा गठबंधन की ताकत पर अलग-अलग कयास लगा रहे हैं। सपा-कांग्रेस गठबंधन यहां अपने पक्ष में बिहार विधानसभा चुनावों में बने महागठबंधन की तरह सफलता की उम्मीद में है। बसपा दलित-मुस्लिम एजेंडे को सफल मानते हुए अपनी जीत का दावा कर रही है। जबकि भाजपा अभी भी लोकसभा चुनाव में चली लहर का प्रभाव मानकर बहुमत का दावा कर रही है। प्रदेश में रालोद भी अपनी ताकत बढ़ने तथा किसी भी दल को बहुमत न मिलने की आशा में स्वयं को किंग मेकर मान रहा है। सपा-कांग्रेस गठबंधन तथा अन्य तीनों दलों के दावों की हकीकत 11 मार्च को इवीएम खुलने पर सामने आयेगी।

किसे मिलेगी यूपी की कमान

किसी भी दल को बहुमत न मिलने की बात अधिकांश लोगों की ओर से कही जा रही है। यदि ऐसा होता है तो यह सवाल खड़ा होता है कि ऐसे में सबसे बड़ी ताकत कौन हो सकता है? इसका उत्तर 19 फीसदी मुस्लिम मतों के रुख पर बहुत कुछ निर्भर करता है। इन मतों ने यदि सपा-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में एकजुटता दिखाई होगी तो यह गठबंधन सबसे बड़ी ताकत ही नहीं बल्कि बहुमत से सत्ता में आ सकता है। परंतु ऐसा हुआ नहीं। मुस्लिम मतों के यहां खासतौर से तीन दावेदार हैं। बसपा और रालोद भी इनमें साझीदार हैं। मायावती ने तो खुलकर दलित-मुस्लिम कार्ड खेला है। उन्हें इसका कितना लाभ मिलेगा? यह 11 मार्च को पता चलेगा। उनके पक्ष में मुस्लिम वोट एकजुट नहीं हो सका। रालोद को भी इस समुदाय का आंशिक वोट चंद सीटों पर मिला है। ओवैसी की पार्टी ने भी वर्ग के मतों में सेंधमारी की है। इस वर्ग का वोट गत चुनाव में सपा के पक्ष में ध्रुवीकृत हुआ था तो उसका लाभ उसे मिला जिससे वह भारी बहुमत से पहली बार प्रदेश में सत्तासीन हुई। सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का वोट इस बार भले ही सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर बताया जा रहा हो लेकिन ऐसा नहीं है। बसपा के पक्ष में कई स्थानों पर इस समुदाय का जबरदस्त रुख रहा है। यह बिखराव ही इनमें दोनों ताकतों में से किसी को भी आशातीत ताकत नहीं दे पा रहा।

उधर भाजपा के पक्ष में भी लोकसभा चुनाव वाली लहर कहीं नहीं दिखी। उसके दो मजबूत वर्ग दलित और जाट उससे पूरी तरह नहीं जुड़ पाये बल्कि ये दोनों वर्ग उसके खिलाफ गये हैं। कुछ इलाकों में जाट भाजपा के पक्ष भी रहे हैं। कहा जाये तो पिछड़े वर्ग में भी भाजपा के साथ जाने का उत्साह नहीं दिखा। नोट बंदी का उतना असर नहीं दिखा, जितना माना जा रहा था। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि भाजपा बहुत कमजोर हो गयी है बल्कि मुस्लिम मतों का बिखराव और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अभी भी ध्रुवीकरण का प्रभाव उसे शक्तिशाली बनाये हुए है। यदि पूरब में उसका प्रचार मजबूत रहा तो वह सबसे बड़ा दल बना रह सकता है तथा अकेले ही सत्ता तक पहुंच जाये, यह कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा। पश्चिम में भाजपा, मध्य में बसपा तथा पूरब में कांग्रेस-सपा गठबंधन शक्तिशाली रहेगा।

-जी.एस. चाहल.


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