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मोदी का विकल्प बनेंगे योगी?

जानकारों की मानें तो योगी ने स्वयं को मोदी से बड़ा हिन्दुत्वादी दर्शाने की होड़ शुरु कर दी है.

उत्तर प्रदेश की सरकार की बागडोर एक सन्यासी के हाथ में आने से भारत की राजनीति की गूढ जानकारी रखने वाले लोगों के जेहन में कई तरह के सवाल उत्पन्न होने शुरु हो गये हैं। मुख्यमंत्री की ताजपोशी से ठीक एक दिन पहले मुख्यमंत्री की रेस में मनोज सिन्हा का नाम लगभग तय हो गया था। कई खबरिया टीवी चैनलों ने तो उनके नाम को इस तरह प्रसारित करना शुरु कर दिया था कि लगने लगा था, जैसे उनके नाम पर अंतिम निर्णय हो चुका। योगी आदित्यनाथ का नाम पहले तो रेस में था ही नहीं। एक दो बार उनके नाम की मामूली सी चर्चा हुई भी थी। राजनाथ सिंह और स्वतंत्रदेव सिंह के नाम भी उनसे बहुत आगे थे। बल्कि दिनेश शर्मा और केशवप्रसाद मौर्य दोनों को भरोसा था कि उन्हें मौका मिल सकता है लेकिन जैसे ही अमित शाह ने मौर्य के बजाय किसी और का नाम लाने की बात की थी तो उन्हें दिल का दौरा पड़ गया था। उसी समय से सभी लोग मनोज सिन्हा को मजबूत मान रहे थे।

मोदी का विकल्प बनेंगे योगी?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

राजनाथ सिंह से लेकर सिन्हा तक जितने भी नाम सीएम के लिए चले उनमें योगी का कहीं भी नामोनिशान तक नहीं था। सवाल उठता है कि फिर एनवक्त पर योगी का नाम कहां से आ गया?

हम सभी जानते हैं कि भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीतिक शाखा है जो संघ द्वारा, संघ के एजेंडे पर चलायी जाती है। यह भी सभी जानते हैं कि संघ दक्षिणपंथी हिन्दू संगठन है जिसका मूल उद्देश्य भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है। इसके लिए उसके सारे आनुषांगिक संगठन उसके निर्देशन में पूरे मनोयोग से कार्य कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आगे कर वे अपना संकल्प पूरा करना चाहते थे लेकिन गौहत्या जैसे मामले में गुजरात में हुई एक घटना के बाद उनके एक बयान से संघ नेतृत्व थोड़ा असहज हुआ। हालांकि नरेन्द्र मोदी एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री होने के नाते बहुत सोच-समझकर बोलने का प्रयास करते हैं।

संघ उत्तर प्रदेश की सपा सरकार के दौरान भी केन्द्र सरकार की कार्यप्रणाली से असहज था। राजनीति के जानकारों का कहना है कि मोदी संघ के संगठन से बड़े होते जा रहे हैं। लोग भाजपा सरकार के बजाय मोदी सरकार और मोदी-मोदी का राग अलापते जा रहे हैं। इसमें संघ और भाजपा बहुत पीछे छूटते जा रहे हैं।

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संघ कभी नहीं चाहता कि कोई व्यक्ति संगठन से ऊपर हो। वे संघ को सर्वोच्चता देते हैं। यही संघ की ताकत है जिसके बलपर वह हमेशा मजबूत होता जा रहा है। संघ एफडीआई के संख्त खिलाफ था। जबकि मोदी कई मामलों में से सौ फीसदी एफडीआई तक की इजाजत दे चुके। विदेशी कंपनियों को देश में बुलाने के लिए वे कांग्रेस से भी बहुत आगे निकल गये जबकि संघ इसका सख्त विरोधी रहा है। उसकी शाखा स्वदेशी जागरण मंच इसका मुखर और सख्त विरोधी है।

संघ के आनुषांगिक संगठन भारतीय मजदूर संघ और किसान संघ, मजदूरों और किसानों के प्रति मोदी सरकार के रवैये से भी खुश नहीं। हिन्दुत्व के मामले पर भी वे शिथिल होते जा रहे हैं।

इसके अलावा भी कई कारण हैं जिन्होंने नरेन्द्र मोदी से भी कट्टर हिन्दुवादी छवि के व्यक्ति को मोदी के विकल्प में लाया जाये। निश्चित तौर पर योगी आदित्यनाथ ऐसे में संघ को सबसे योग्य व्यक्ति दिखाई दिये होंगे। यही कारण है कि एक युवा तथा कट्टर हिन्दुवादी योगी आदित्यनाथ को संघ ने मोदी और शाह की पसंद के विपरीत देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनाना बेहतर समझा होगा। यही वजह दिखती है कि योगी ने कुर्सी संभालते ही हिन्दुत्व से जुड़े मुद्दों को तरजीह देनी शुरु कर दी। विकास से जुड़े मुद्दों पर हिन्दुत्व हावी रहने के ये संकेत हैं। संघ के पास अपना उद्देश्य साधने के लिए मोदी के विकल्प के रुप में एक मजबूत हिन्दुत्वादी चेहरा आ गया है।

2019 तक नरेन्द्र मोदी की आयु 75 की हो जायेगी। ऐसे में हो सकता है संघ उन्हें भी उम्रदराज नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की लाईन में खड़ा कर दे। उस समय संघ के पास कट्टर हिन्दुवादी युवा नेता नरेन्द्र मोदी के विकल्प के रुप में होगा।

ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि क्या योगी मोदी का विकल्प होंगे? जानकारों की मानें तो अभी से योगी ने स्वयं को नरेन्द्र मोदी से बड़ा हिन्दुत्वादी दर्शाने की होड़ शुरु कर दी है।

-जी.एस. चाहल.


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