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राजनीति की अंधेरी गुफा में भटकती सपा

टकराव यादव कुनबे की राजनीति को अंधी गुफा में ले जायेगा, जहां भटकाव के अलावा कुछ नहीं.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के परिणामों से मुलायम सिंह यादव के परिवार की कलह और बढ़ेगी। पिता और पुत्र के बीच आपसी कड़वाहट जो चुनावों तक अंदर-अंदर दोनों को परेशान कर रही थी, वह अब बाहर निकलनी शुरु हो गयी हैं। ऐसे में अब अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक रास्ते अलग-अलग हो जायेंगे।

चुनावी हार-जीत के कारण कई चीजों पर निर्भर करते हैं। कई बार जनता के मिजाज का रुख भांपने में दिग्गज राजनीतिज्ञ भी विफल हो जाते हैं। लाख कोशिश के बाद भी सफलता हासिल नहीं हो पाती। फिर भी यह मानना पड़ेगा कि समझदारी से काम करने पर हार-जीत का अंतर कम किया जा सकता है और नासमझी से उसे बढ़ाया जा सकता है।

राजनीति की अंधेरी गुफा में भटकती सपा

उत्तर प्रदेश की सत्ता की ताकत अनुभवहीन नवयुवक को थमाने का खामियाजा सपा को भुगतना पड़ा है। इसके पीछे मुलायम सिंह की क्या मजबूरी अथवा पुत्र प्रेम रहा होगा, उसे वे ही सबसे बेहतर जानते होंगे। इसका पछतावा मुलायम सिंह को बार-बार होता रहा है। वे इशारों में कई बार बेटे को अपने दिल की बात कह चुके थे तथा कई बार उन्हें अपनी इस मजबूरी या गलती का अहसास सार्वजनिक करने को भी बाध्य होना पड़ा। उन्होंने कई बार न चाहते हुए भी कहा कि किसी नेता ने भी राजनीति में अपने बेटे को अपने रहते हुए मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इसके पीछे यह भी संदेश छिपा था कि इस उपकार या मजबूरी का अनावश्यक लाभ उठाने का काम बड़ी राजनीतिक बेवकूफी भी हो सकती है। मुलायम सिंह यादव बार-बार खुले मंचों तक से कहते रहे कि सत्ता के कारण चापलूस उनके इर्दगिर्द जमा होकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। सत्ता खिसकते ही पास तक भी नहीं फटकेंगे। वास्तव में पिता-चाचा और उनके वफादार साथियों के लंबे संघर्ष की बदौलत जिस सपा को सत्ता शिखर प्राप्त हुआ था, नवयवुक अखिलेश यादव को यूं ही उसका स्वाद चखने का मौका मिल गया था। नवयुवक सत्ता के नशे में अपने बुजुर्गों और शुभचिंतकों के बजाय चापलूस व खुदगर्ज चौकड़ी के मगरमच्छों का खिलौना बन गया। इसी नशे ने अखिलेश यादव को अपने चाचा और उनसे भी अधिक आदरणीय पिता को उस ताकत के बल पर, जो इन्हीं से मिली थी, पलभर में अर्श से फर्श पर पटक दिया।

चुनाव के दौरान जो सपा मैदान में थी, वह भाजपा की प्रमुख प्रतिद्वंदी जरुर थी लेकिन उसका एक द्वंद आपस में छिड़ चुका था। एक ओर सपा-सपा से लड़ रही थी, दूसरी वह भाजपा और बसपा से भी लड़ रही थी। सपा की पहली आपसी लड़ाई उम्मीदवारों के चयन पर हुई। एक-एक सीट पर दो-दो बार उम्मीदवार उठाये-बिठाये गये। इस आपसी युद्ध को सपा के भीतर और बाहर दोनों तरह के लोगों ने देखा, जनता समझ गयी। आपस में लड़ने वालों को हार से कोई नहीं बचा सकता। गृह युद्ध, सर्वनाश का सबसे बड़ा साधन है।

मसलन लंकापति रावण का सारा परिवार उसके साथ था। राम उसे परास्त करने में जब सफल नहीं हुए, तो रावण के परिवार के एकमात्र सदस्य की खिलाफत से राम ने उसे आसानी से मार गिराया।

यदि मुलायम सिंह यादव का कुनबा हमेशा की तरह उनके अनुशासन में काम करता तो भले ही सपा सत्ता तक न पहुंचती लेकिन जिस दुदर्शा को वह इस चुनाव में पहुंची, वह उससे कहीं बेहतर हालत में होती। आगे इसमें सुधार के बजाय और बदहाली की उम्मीद है क्योंकि अब पुत्र-पिता में विवाद की खाई और भी बढ़ेगी। इस हार का ठीकरा दोनों धड़े एक दूसरे पर फोड़ रहे हैं। यही टकराव यादव कुनबे की राजनीति को अंधी गुफा में ले जायेगा। जहां भटकाव के अलावा कुछ नहीं होगा।

जिन हथकंडों को राजनैतिक सफर में मुलायम सिंह यादव दूसरों पर इस्तेमाल कर अपना रास्ता बनाते रहे, यदि आज ये भी किसी ऐसे हथकंडे के शिकार हो गये तो उन्हें पछतावा नहीं होना चाहिए।

-जी.एस. चाहल.


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