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लोकतंत्र का चौथा स्तंभ सत्ता के शिकंजे में

चौथा स्तंभ बार-बार भटक रहा है या जानबूझकर दायित्वहीनता की ओर बढ़ रहा है.

दिल्ली एमसीडी चुनाव पर मीडिया कुछ ज्यादा ही मुखर है। लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ बार-बार भटक रहा है या जानबूझकर दायित्वहीनता की ओर बढ़ रहा है। मीडिया में सत्ता पक्ष की वकालत तथा विपक्ष के विरोध की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। मुझे पचास वर्षों से अधिक का समय पत्रकारिता से जुड़े हुए और छोटे-बड़े पत्रकारों के साथ काम करने का अवसर मिला है लेकिन आजकल इस क्षेत्र में जिस तरह की कार्यप्रणाली हावी हो गयी है वह भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ सत्ता के शिकंजे में

सभी लोग जानते हैं कि दिल्ली राज्य सरकार के अधिकार दूसरे राज्यों यथा उ.प्र., बिहार, म.प्र. अथवा पंजाब आदि से कई मामलों में कम हैं। यहां की सरकार के पास अपनी पुलिस भी नहीं है। ऐसे में कानून व्यवस्था के लिए भला राज्य सरकार को कैसे कटघरे में खड़ा किया जा सकता है। जब यह मामला और भी पेचीदा हो जाता है जब वह पुलिस राज्य सरकार की विपक्षी तथा सर्वशक्तिमान केन्द्र सरकार के हाथ में हो। कई तरह के अधिकारियों की नियुक्तियों तक का अधिकार भी दिल्ली सरकार के हाथ में नहीं बल्कि जोकि राज्य की विपक्षी केन्द्र सरकार है उसी के द्वारा नियुक्त उप-राज्यपाल भी केन्द्र सरकार की शह पर ही काम करता है। पुलिस और उप-राज्यपाल दो बड़ी ताकतें हैं। यदि वे राज्य सरकार के बजाय विपक्षी सरकार की हों तो भला राज्य सरकार को वे ठीक तरह से क्यों काम करने देंगी? दिल्ली में इन शक्तियों का केन्द्र सरकार राज्य की 'आप’ सरकार के खिलाफ दुरुपयोग करती रही है।

अभी तीनों महानगर निगमों में व्याप्त भ्रष्टाचार का ठीकरा भी मीडिया के प्रचार के कारण आम आदमी पार्टी पर फोड़ा गया। जहां तीनों स्थानों पर भाजपा सत्तासीन थी। केन्द्र सरकार भाजपा की, महानगर निगम भाजपा की, पुलिस प्रशासन और एलजी भाजपा का और दिल्ली की हर जिम्मेदारी आप की। मीडिया भाजपा का भोंपू बनकर सारा दोष आम आदमी पार्टी के सिर मंढ रहा है। बेतुके सवाल किये जा रहे हैं। पहली बार आप के 46 पार्षद एमसीडी में पहुंचे, फिर भी शोर मचाया जा रहा है कि एमसीडी में आप का सफाया हो गया जबकि पहले उसका एक भी पार्षद नहीं था। इस लिहाज से यह उसकी उपलब्धि है। उसने पंजाब में भाजपा को समेटकर 22 सीटें जीत कर दूसरी बड़ी पार्टी बनकर दिखाया। वहां भी उसे कमजोर बताया जा रहा है।

भाजपा नेतृत्व जिस प्रकार लोकतंत्र को कमजोर करने में लगा है, वह उसकी चाल, चरित्र और चेहरे का मौलिक स्वरुप है लेकिन इस तरह की ताकतों के साथ कदमताल करना भारतीय पत्रकारिता का चरित्र नहीं होना चाहिए। जब भारी बहुमत प्राप्त कोई भी राजनैतिक दल मनमानी की ओर बढ़ने का प्रयास करे तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अपना दायित्व निभाते हुए उसे निष्पक्ष और निस्वार्थ होकर देश की जनता के सामने रखना चाहिए। हम ऐसा नहीं कर रहे। न्यायपालिका और मीडिया लोकतंत्र के रखवाले और रक्षक हैं।

-जी.एस. चाहल.


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