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बहुत हो गया, और नहीं सहेगा अन्नदाता

आयेदिन आर्थिक बदहाली के कारण आत्महत्या करने वाले किसानों की सूची लगातार लंबी हो रही है.

जिस प्रकार से साढ़े तीन वर्षों से भारतीय जनता पार्टी किसानों को बहला और बहकाकर अपना उल्लू सीधा करती आ रही है उसकी हकीकत वे भोले किसान भी समझने लगे हैं जो आंख मूंद कर उसका समर्थन करते आ रहे थे। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और जम्मू कश्मीर के किसानों ऋका विरोध इस बात को भली भांति स्पष्ट कर रहा है। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का लाभ उठाकर इन राज्यों में सत्ता पर काबिज हुई भाजपा को बहुत बड़ी गलतफहमी है, वह जिन जनविरोधी नीतियों को जर्बदस्ती लोगों पर लादकर सत्ता बचाने में लगी है, उन्हीं के कारण यह पार्टी अपने साथ देश को विकास के बजाय विनाश की ओर धकेलने का काम कर रही है।

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सबसे बड़ा धोखा किसान और मजदूर वर्ग के साथ किया जा रहा है और जनता की गाढी कमाई के धन को पहले से अकूत धन दौलत के मालिक फिल्म स्टारों, क्रिकेटरों तथा बड़े मीडिया घरानों को विज्ञापनों के बहाने दिया जा रहा है. सरकारी योजनाओं में खर्च होने वाले धन के एक बड़े हिस्से को प्रधानमंत्री की तारीफ के विज्ञापनों पर दोनों हाथों से लुटाया जा रहा है.

देश के लोगों का पेट भरने वाले अन्नदाता को अपनी कमाई के जब उचित मूल्य की मांग की जा रही है तो उससे देश की अर्थव्यवस्था खतरे में जाने का रोना रोया जा रहा है। एक ओर किसानों के बेटे देश की रक्षा के लिए सीमा पर शहीद हो रहे हैं वहीं किसान अपनी जायज मांगों की मांग करते हुए सरकारी बंदूकों की गोलियों के निशाने पर हैं। महाराष्ट्र और गुजरात में आयेदिन आर्थिक बदहाली के कारण आत्महत्या करने वाले किसानों की सूची लगातार लंबी होती जा रही है। यदि अब भी सरकार ने अपना रवैया नहीं बदला और किसानों की उपेक्षा जारी रखी तो सबसे बड़ी आबादी के राज्य उत्तर प्रदेश में भी किसान आंदोलन आक्रामक रुप ले लेगा। तब राजस्थान, हरियाणा तथा बिहार भी उससे अछूते नहीं रहेंगे। उत्तर प्रदेश में कई किसान संगठनों ने केन्द्र सरकार के उस वायदे को याद दिलाया है जिसमें स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करने को तीन वर्ष पूर्व किसानों से किया गया था। केन्द्र और सूबा दोनों जगह भाजपा की सरकार है लेकिन वह अब इस विषय पर बिल्कुल खामोश हो गयी है तथा नये-नये ढंग रचकर मूल विषय से किसानों को भटकाना चाहती है। किसान इस सिलसिले में लामबंद हो रहे हैं तथा तेज आंदोलन की तैयारी चल रही है।

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किसानों की ऋण माफी जिसे बिना लागू किये ही प्रचार किया जा रहा है, वह उत्तर प्रदेश में सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनने जा रहा है। सहकारी बैंकों के चंद डिफाल्टर किसानों के ऋण माफ करके यह प्रचार किया जा रहा है कि सरकार ने छोटे किसानों के ऋण माफ कर दिये। यह केवल सहकारी बैंक ऋण का ही बीस फीसदी बैठता है जबकि अधिकांश किसानों के किसान क्रेडिट कार्ड राष्ट्रीयकृत बैकों के हैं। इसमें छोटे किसानों की संख्या ही करोड़ों में हैं जबकि यह ऋण अरबों रुपयों का है। इनमें से किसी भी किसान की एक पाई तक माफ नहीं की गयी और न ही माफ करने की उम्मीद लग रही है। क्योंकि सरकार कह रही है कि उसने किसानों का कर्ज माफ कर दिया। यदि राष्ट्रीयकृत बैंकों में भी सहकारी बैंकों की तरह ऋण माफी न करने के बराबर ही होगा तथा इसके बाद किसानों में गुस्से का लावा फूट सकता है।

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किसान सहकारी समितियों तथा सहकारी बैंकों ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्जदार किसान तीस जून तक बकाया कर्ज राशि जमा कर दें अन्यथा उन्हें तीन फीसदी के बजाय 22.50 फीसदी ब्याज देना होगा. यह किसानों की गर्दन काटने से कम नहीं है. जो लोग तीन फीसदी ब्याज चुकता करने की हालत में नहीं, वे 22.50 फीसदी ब्याज कहां से जमा करेंगे.

उत्तर प्रदेश के किसान इस ताजा फरमान से परेशान हैं तथा सभी किसान संगठन लामबंद होकर बड़े आंदोलन की तैयारी में हैं। पूरे प्रदेश के लगभग सभी जिला मुख्यालयों पर सरकार को ज्ञापन दिये गये हैं। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं तथा केन्द्र में तो वह सत्तासीन है ही, ऐसे में उसे यह कहने का बहाना भी नहीं होगा कि दूसरी पार्टी की राज्य में सरकार किसानों का शोषण कर रही है, केन्द्र नहीं। आधा भारत इन राज्यों में आबाद है। सरकार को गंभीरता से विचार कर किसानों से किये वायदे ईमानदारी के साथ पूरे करने चाहिए। अन्यथा यह देश, किसान तथा सरकार सभी के लिए शुभ नहीं होगा।

-जी.एस. चाहल.


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