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बढ़ती आबादी बरबादी का सबब

कुछ लोगों ने देश को मिली आजादी को बच्चे पैदा करने की आजादी मान लिया है.

सारी समस्याओं की जड़ बढ़ती आबादी को काबू करने की ओर से सरकार ने आंखें बंद कर ली हैं। विकास और कानून व्यवस्था के लिए माथापच्ची की जा रही है। यह उसी तरह है जैसे जड़ काटने के बजाय पत्ते तोड़े जा रहे हों। और पेड़ खत्म करने की उम्मीद की जा रही हो।

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सरकारें अपनी जड़ मजबूत करने के लिए लोकलुभावन वायदे कर-कर कुर्सियों पर जमा रहती हैं। एक बार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आबादी रोकने को अच्छा कदम उठाया था। पूरे विपक्ष और तत्कालीन मीडया ने उसके खिलाफ ऐसी एकजुटता दिखाई कि उन्हें सत्ता से हाथ धोना पड़ा। भले ही वे एक बार फिर से सत्ता में आयीं लेकिन उन्होंने आबादी नियंत्रण पर बल नहीं दिया। यही नहीं उनके बाद कांग्रेस या गैर कांग्रेसी जो भी सरकार आयी किसी ने भी इस ओर गंभीरता से नहीं काम किया।

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वही हाल नरेन्द्र मोदी सरकार का है। भारी बहुमत और अधिकांश राज्यों में सत्ता के बावजूद देश के सबसे ज्वलंत मुद्दे पर बोलने वाला पीएम बिल्कुल मौन है। इंदिरा गांधी को लगे उस झटके से लगता है यह सरकार भी भयभीत है।

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तेजी से बढ़ रही आबादी अर्थव्यवस्था पर हावी है। कुछ लोगों ने देश को मिली आजादी को बच्चे पैदा करने की आजादी मान लिया है। वे अपनी इस आजादी से अपनी तथा अपने देश की बरबादी के लिए जी जान से समर्पित हैं। सरकारें भी आंख मूंद कर उन्हें धन्यवाद देती आ रही हैं और चुनावी मौसम में तरह-तरह के वादे कर इस आबादी से वोट प्राप्त कर सत्ता सुख प्राप्त करती रही हैं।

-जी.एस. चाहल.


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