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कहीं बाढ़ का कहर-कहीं वर्षा की दरकार

गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र तथा असम जैसे सूबों में भीषण बाढ़ की तबाही शुरु हो गयी है.

हमारे देश में मानसूनी बारिश बहुत ही असंतुलित और अनिश्चित होती है। इससे कई स्थानों पर जहां नाम मात्र का पानी बरसता है वहीं बहुत से स्थानों में बाढ़ के कहर से प्रतिवर्ष भारी जन-धन की हानि होती है। दरअसल मानव द्वारा अंधाधुंध और अनियोजित ढंग से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से भी बाढ़ के खतरे बढ़े हैं। हालांकि बाढ़ को नियंत्रित या कम करने के उपायों में देश में नदियों पर बड़े-बड़े बांध बनाये गये हैं जिनसे कम वर्षा वाले इलाकों में जल पहुंचाने को नहरें भी निकाली गयी हैं।

अभी आधा सावन बीता है तथा डेढ़ माह यानि भादों के अंत तक बरसाती मौसम रहेगा।

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गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र तथा असम जैसे सूबों में भीषण बाढ़ की तबाही शुरु हो गयी है। अकेले गुजरात में ही सत्ता से अधिक लोगों की मौत हो चुकी। आधे से अधिक असम राज्य में बाढ़ में हजारों गांवों में अपना रौद्र रुप दिखाया है जिसका तांडव अभी जारी रहेगा।

देश के कई भागों में अभी भी सामान्य से कम वर्षा हुई है। किसान भारी बरसात की उम्मीद लगाये बैठे हैं। लेकिन बादल दर्शन देकर या तो बूंदाबांदी करते हैं अथवा बिना बरसे ही चले जाते हैं। देश में कहीं पानी जरुरत से अधिक बरस रहा है और कहीं उससे बहुत कम। पूरे राज्य में अलग-अलग मौसम है। कई जनपदों में भी बरसात की मात्रा में भारी अंतर है। यूपी के अमरोहा जिले की धनौरा और हसनपुर तहसीलों का खादर क्षेत्र बाढ़ का सामना कर रहा है जबकि गैर खादर क्षेत्र में अभी किसानों को जरुरत के लिए भी बारिश की दरकार है। इस मौसमी विषमता का हमारे किसानों पर अच्छा और बुरा प्रभाव पड़ता है।

हमें दोनों ही परिस्थितियों का सामना करने को तैयार रहना पड़ता है। फिर भी बरसाती मौसम में भारी बरसात तो होनी ही चाहिए। बिना बरसात तो कुछ भी नहीं होने वाला।

-टाइम्स न्यूज़ ब्यूरो.


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