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जाटों को राजनीतिक मैदान से बाहर धकेलने का षड़यंत्र : भाजपा में राजनैतिक भविष्य तलाश रहे जाट ऊहापोह में

कई नवयुवक समर्पित भाव से पार्टी से जुड़े, बहुमत की सरकार बनने के बाद उन्हें किनारे कर दिया गया है.

यह एक बार फिर स्पष्ट हो गया है कि भाजपा जाट विरोधी है। इस दल में इस बिरादरी के लिए कोई स्थान नहीं है। जिले के जाटों के उद्धार का ठेका चुनाव से पूर्व लेने वाले डा. संजीव बालियान सूबे में भाजपा की सरकार बनते ही कहीं गुम हो गये हैं। प्रदेश के जिन होनहार जाट नवयुवकों ने तन, मन और धन से चुनाव में भाजपा की विजय के लिए जो सहयोग दिया, वे अब अपनी उपेक्षा से असमंजस में फंस गये हैं तथा अपने राजनैतिक भविष्य को लेकर ऊहापोह की हालत में हैं। कई अभी भी भाजपा नेतृत्व के झूठे आश्वासनों पर भरोसा कर पार्टी में सुनहरे सपनों की मृगमरीचिका में फंसे हैं।

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युद्धवीर सिंह, डॉ. हरि सिंह ढिल्लों, भूपेंद्र सिंह, वीरेंद्र सिंह और सुरेंद्र औलख.
लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जिले के जाटों ने जिस एकजुटता के साथ भाजपा को वोट दिया, वैसा दूसरी किसी बिरादरी ने नहीं दिया। दोनों चुनावों में यहां का एक विशाल वोट बैंक निर्णायक रहा है। यही वोट बैंक एकजुट होकर जिस दल के भी साथ जाता वही विजय प्राप्त करता। आमतौर से पिछले कई चुनावों में यह वोट बैंक कभी भी इतना एकजुट नहीं हुआ। फिर भी सपा और बसपा की सरकारों के दौरान कई महत्वपूर्ण पदों पर इस बिरादरी के कई नेताओं को मौका मिला। सांसद और विधायक बल्कि मंत्री पदों तक इस बिरादरी को स्थान मिला।

कई जाट नेता विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारी की आशा अंत तक लगाये रहे, युद्धवीर सिंह तथा डा. हरि सिंह ढिल्लो उनमें प्रमुख थे। चारों सीटों पर जनपद में निर्णायक मत होने के बावजूद एक भी सीट से भाजपा ने जाट को उम्मीदवारी देने लायक नहीं समझा। कई नवयुवक जो बड़े समर्पित भाव से इस पार्टी से जुड़े, उन्हें भी अब सूबे में बहुमत की सरकार बनने के बाद किनारे कर दिया गया है। ऐसे नवयुवकों में अजीत चौधरी का नाम सबसे ऊपर है। जिला पंचायत चुनाव में उन्हें ऐसे वार्ड से लड़ाया गया जहां से कोई भी तैयार नहीं था। उन्हें दो बार इसी तरह चुनावी शहीद बनाया गया।

जिस बिरादरी में इफको के राष्ट्रीय अध्यक्ष, कैबिनेट मंत्री, डीसीबी चेयरमैन, सांसद, विधायक, ब्लॉक प्रमुख आदि प्रतिष्ठित पदों पर अनेक लोग आसीन रहे. भाजपा के केन्द्र और सूबे में सरकार बनते ही ऐसा क्या हो गया कि आज एक भी जाट ब्लॉक प्रमुख के पद तक भी नहीं पहुंच पा रहा?

जिला पंचायत तख्ता पलट के लिए भाजपा के एक बड़े नेता ने भूपेन्द्र सिंह को तैयार कर लिया और दूसरे बड़े नेता ने तख्ता पलट विफल कराने को सपा का साथ दिया। परिणाम सामने है। यही स्थिति गजरौला ब्लॉक प्रमुख के तख्ता पलट में रही। तैयारी मजबूत थी। वीरेन्द्र सिंह के पास कोरम पूरा था लेकिन फिर बिरादरी में विभाजन के लिए भाजपा नेतृत्व की ओर से दूसरे जाट का समर्थन किया गया। लाभ सपा को हुआ। फिलहाल मुमताज अली भुट्टो की कुर्सी सुरक्षित है।

नगर निकाय चुनाव में कुछ नवयुवक भाजपा की उम्मीदवारी की उम्मीद में हैं। गजरौला पर ही सारा जोर है। लेकिन भाजपा की रणनीति से यही लगता है कि यहां भी इस बिरादरी को निराशा ही हाथ लगेगी। क्योंकि उन्हें विभाजित कराने वाले तो पहले ही तैयार हैं लेकिन बिरादरी में गजरौला में जितने घर हैं उतने ही नेता चेयरमैन बनने को तैयार बैठे हैं।

जिस बिरादरी में इफको के राष्ट्रीय अध्यक्ष, कैबिनेट मंत्री, डीसीबी चेयरमैन, सांसद, विधायक, ब्लॉक प्रमुख आदि प्रतिष्ठित पदों पर अनेक लोग आसीन रहे। भाजपा के केन्द्र और सूबे में सरकार बनते ही ऐसा क्या हो गया कि आज एक भी जाट ब्लॉक प्रमुख के पद तक भी नहीं पहुंच पा रहा? क्या हमारे द्वारा ऐसी पार्टी की गोद में बैठ जाना है, जिसका पुराना इतिहास हमारे सिद्धांतों के विपरीत रहा है?

-टाइम्स न्यूज़ अमरोहा.


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