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किसानों की तरक्की के अभाव में उद्योगों का विकास भी नहीं

नोटबंदी के बाद से विकास दर गिर रही है और जीएसटी ने और भी मामला खराब किया है.

उत्तर प्रदेश का किसान, केन्द्र और प्रदेश सरकार की नीतियों से खुश नहीं है। उसे दोनों ही सरकारों ने बहलाया-फुसलाया और सत्ता तक पहुंचने से पूर्व जिन वायदों को किया था बाद में उन्हें भूल-भुलैया में उलझाकर किसानों को और भी दुविधा में डाल दिया। पिछले तीन सालों से लगातार किसानों के साथ छल किया जा रहा है। इसके विपरीत किसानों और गरीबों की भलाई का शोर मचाकर गिने-चुने उद्योगपतियों को अधिक से अधिक लाभान्वित करने की कोशिशें जारी हैं। जिससे शुरु में तो उद्योगपतियों को लाभ होता दिखा लेकिन जैसे-जैसे किसानों और उनके साथ काम कर रहे ग्रामीण मजदूरों की आय गिरती गयी, वैसे ही वैसे बाजारों की चहल-पहल घटती रही। छोटे शहरों के दुकानदारों की आमदनी घटती गयी। इन दुकानदारों से माल खरीदने वाले गांवों के किसान-मजदूर तथा छोटे कारीगर हैं। इस समुदाय की जेब हल्की होने से बाजार और घरेलू निवेश पर बुरा असर पड़ा।

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दुकानदार उद्योगों के उत्पादों को बेचते हैं जिनमें छोटे, मझले और बड़े सभी तरह के उद्योग होते हैं। इनके उत्पादों की मांग उपरोक्त बहुसंख्यक तबके की जेब हल्की होने से घटी। लिहाजा कई तरह की कंपनियों का उत्पादन भी मांग घटने से गिरता चला गया। चालू वित्त वर्ष में इसी कारण पहली तिमाही में जीडीपी धड़ाम हो गयी। नोटबंदी के बाद से विकास दर लगातार गिर रही है और त्रुटिपूर्ण तरीकों से तैयार जीएसटी ने और भी मामला खराब किया है। इसके सबसे अधिक दुष्परिणाम कृषि और असंगठित क्षेत्र के कामगारों को भुगतने पड़ेंगे। बल्कि अभी से उनकी मुसीबतें बढ़नी शुरु हो गयी हैं।

पहले ही बेरोजगारी, खस्ताहाल आर्थिक स्थिति और महंगी होती शिक्षा, स्वास्थ्य तथा आम जरुरत की चीजों से हलाक किसान, मजदूर तथा गरीब पर डाले प्रत्यक्ष करों के भार से सरकार भले ही अमीर होने की सोच रही हो लेकिन इससे आम आदमी की आय घट रही है। जिससे बाजार सूने हैं और उद्योगों में ताले पड़ते जा रहे हैं। नयी गन्ना और कृषि नीति किसानों की आर्थिक कमर तोड़ने का एक और सरकारी षड़यंत्र है। गन्ने का अच्छा उत्पादन होने और गोदामों में पर्याप्त चीनी के कारण गन्ना सीजन में सरकार द्वारा चीनी आयात करने से उसकी किसान विरोधी नीयत का पता चलता है।

-जी.एस. चाहल.


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