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बढ़ते बुतों से शांति को खतरा

बढ़ती आबादी के कारण पहले ही स्थिति विस्फोटक है वहां बुतों की आबादी को लेकर चिंता भी जरुरी है.

जब शरारती तत्वों को शांति भंग करने में अपने दूसरे सभी हथकंडे विफल होते दिखते हैं तो वे किसी मूर्ति को खंडित कर शांति से जीवन जी रही जनता में भी ज्वाला भड़काने की कोशिश करते हैं। कई जगह समझदार लोग उनकी मंशा को सफल नहीं होने देते। जबकि कई जगह नासमझ लोग इस तरह की घटनाओं से उत्तेजित होकर सामान्य जनजीवन में जहर घोल कर शरारती तत्वों की साजिशों में शह देते हैं, जिसका दुष्परिणाम वे स्वयं भी भोगते हैं और कई बेकसूर उनके किये की सजा भुगतते हैं।

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मूर्तियों को लेकर भारत सहित दुनिया में मूर्ति पूजकों और मूर्ति भंजकों में अनेक बार संघर्ष और युद्ध हुए हैं। इन मूर्तियों के पीछे न जाने कितने लोगों की हत्यायें हुई हैं तथा आजाद भारत में भी कई बार वीभत्स दंगों के दौर चले हैं लेकिन न तो मूर्ति पूजक टस से मस हुए और न ही मूर्ति विरोधी अपनी धारणा से हटे।

हमारे देश में मूर्तियां स्थापित करने और उनकी उपासना की प्राचीन परंपरा है। पहले जहां देवी-देवताओं की मूर्तियां पूजा स्थलों में स्थापित की जाती थीं वहीं आज आपको हर चौराहे या जहां भी जगह मिलती है नेताओं की प्रतिमायें देव प्रतिमाओं से भी अधिक संख्या में लगाने का प्रचलन तेजी पकड़ता जा रहा है। यही नहीं हर जाति-बिरादरी या छोटे-छोटे संगठनों के लोग भी अपने स्थानीय या क्षेत्रीय नेता की मूर्तियां जगह-जगह लगा रहे हैं।

सबसे मजेदार बात यह है कि मूर्तियों का विरोध करने वाले महापुरुषों और नेताओं की मूर्तियां उनके समर्थक उनकी मौत के बाद स्थापित करने से बाज नहीं आ रहे। भेड़ाचाल बन गये इस कृत्य से शांति व्यवस्था का खतरा बढ़ गया है। अपनी दुश्मनी निकालने के लिए लोग उस वर्ग के सम्मानित व्यक्ति की मूर्ति खंडित कर देते हैं। अराजक तत्व स्वार्थ सिद्धि के लिए यही तरीका निकालते हैं। इससे भी आगे चलें तो कई धूर्त नेता भी जातीय या सामुदायिक ध्रुवीकरण के लिए ऐसा कर देते हैं।

राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारों और चौराहों से लेकर सभी सड़कों के किनारे तथा नगरों और गांवों के गली मोहल्लों में देवी-देवताओं और कलियुगी नेताओं की मूर्तियों की भरमार है। किसी नेता की मौत के बाद उसे मूर्ति के रुप में पुनर्जिवित करने की तैयारी हो जाती है। उसके चमचे उसकी मूर्ति लगाने की मांग करने लगते हैं। चुनाव का मौसम निकट जान मृतक नेता के विरोधी भी इस मांग का समर्थन करने लगते हैं। कई जगह कई नेता इस सूची में मृत्योपरांत शामिल होते हैं तो मूर्ति लगाने को ही विवाद हो जाता है।

देर-सबेर मौका पाकर किसी शरारती तत्व ने यदि बुतों का कोई हाथ-पैर या उंगली तोड़ दी तो फिर कितने बेकसूर और शांतिप्रिय लोगों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। कई जगह डॉ. भीमराव अंबेडकर, किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत सहित कई देवी-देवताओं की प्रतिमायें खंडित की गयी। इनके बाद तनावपूर्ण हालात स्वाभाविक थे। हरियाणा में जाट आंदोलन के दौरान प्रसिद्ध जाट नेता सर छोटूराम की प्रतिमा खंडित की गयी। यह जिन तत्वों ने भी किया उनका उद्देश्य जितना खतरनाक था यह सभी जानते थे।

हाल ही में बिजनौर में किसान नेता चौ. महेन्द्र सिंह की प्रतीमा को क्षतिग्रस्त किया गया। प्रशासन की सतर्कता से मूर्ति को ठीक कर दिया गया। लेकिन जहां भी इस घटना की आवाज पहुंची है किसानों में इसे लेकर गहरी नाराजगी है तथा दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए भाकियू से जुड़े लोग एकजुट होकर विरोध की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चौ. विजयपाल सिंह ने सधी प्रतिक्रिया देते हुए यह शरारती तत्वों का काम है। किसान उत्तेजित न हों, कहकर जिम्मेदारी निभाई है।

केन्द्र सरकार को मूर्ति स्थापना पर विराम लगाने पर भी विचार करना चाहिए तथा उसे इस पर गूढ़ मंथन करने की जरुरत है कि जब जीवित अकेले नेता की सुरक्षा में ही कई सुरक्षाकर्मी लगाने पड़ते हैं तो मरने के बाद बनी उसकी अनेक प्रतिमाओं की सुरक्षा कैसे की जायेगी? ऐसे तो एक समय ऐसा आयेगा कि हर जगह नेता और कथित समाजसेवियों के बुत ही नजर आयेंगे। जहां बढ़ती आबादी के कारण पहले ही स्थिति विस्फोटक होती जा रही हो वहां बुतों की आबादी को लेकर चिंता भी जरुरी है।

-जी.एस. चाहल.


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