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क्या नगर निकायों में जाटों की भागीदारी से बच रही है भाजपा?

साढ़े तीन वर्षों से भाजपा नेतृत्व जनपद के जाट समुदाय को बार-बार समायोजन का भरोसा देता आ रहा है.

यदि जनपद अमरोहा में नगर निकाय में भाजपा द्वारा अध्यक्ष पद का किसी जाट को उम्मीदवार नहीं बनाया गया तो आंख मूंद कर पार्टी का समर्थन करते आ रहे इस विशाल वर्ग में भाजपा के खिलाफ गुस्सा फूटने से कोई रोक नहीं पायेगा।

लोकसभा चुनाव से लेकर बीते विधानसभा चुनाव तक जिले का संपूर्ण जाट समुदाय बिना किसी लोभ-लालच के साथ भाजपा का आंख मूंद कर साथ देता आ रहा है। दूसरी पार्टियों के साथ लंबे समय से जुड़े कई नेता उन्हें छोड़कर इस उम्मीद के साथ भाजपा में आये कि उन्हें समय रहते सत्ता में समायोजित किया जायेगा। प्रधानमंत्री के नारे 'सब का साथ-सबका विकास’ की तर्ज पर जिले में सैनी को अमरोहा, चौहान को नौगांवा, खड़गवंशी को हसनपुर तथा दलित को धनौरा सीट से उम्मीदवार बनाया गया। लोकसभा का प्रतिनिधित्व पहले ही गूजर समुदाय को दिया गया। जिला संगठन की कमान भी इसी समुदाय के व्यक्ति के हाथ में दी गयी। यहां जाट समुदाय खाली हाथ रहा।

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जिले में लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनावों तक जाट समुदाय का विशाल वोट बैंक भाजपा के साथ रहा लेकिन इस समुदाय के एक भी नेता को किसी महत्वपूर्ण पद पर नहीं बैठाया गया। उन्हें बार-बार यही कहकर फुसलाया जाता रहा कि धैर्य रखिये समायोजन किया जायेगा। इस आश्वासन के बाद समुदाय को उम्मीद थी कि जिले के कुल आठ नगर निकायों में गजरौला जाट समुदाय बाहुल्य है। इसलिए कम से कम पार्टी यहां से जाट उम्मीदवार मैदान में लायेगी। अभी तक सांसद कंवर सिंह तंवर, विधायक राजीव तरारा तथा पूर्व सांसद देवेन्द्र नागपाल कहते आ रहे हैं कि गजरौला पर इस समुदाय का हक बनता है। इसी कारण यह अनुमान लगाया जा रहा था कि गजरौला को पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में रखा जायेगा। लेकिन यह अनारक्षित सीट घोषित किया गया। सामान्य और अनारक्षित का शाब्दिक अर्थ अलग है। सामान्य के मायने आम वर्ग तथा अनारक्षित के मायने हैं जो आरक्षण में न आता हो यानि आरक्षित एससी या ओबीसी आदि के अलावा।

भाजपा हमेशा भ्रमार्थक शब्दजाल के पासे फेंककर अपना उल्लू सीधा करती है। गजरौला को अनारक्षित वर्ग में रखने का एकमात्र उद्देश्य यही है कि यहां से ओबीसी या एससी समेत कोई भी आरक्षित वर्ग उम्मीदवार न बन सके।

भाजपा से कई जाट समुदाय के नवयुवक अनारक्षित सीट होने के बावजूद उम्मीदवारी की कोशिश में हैं। ईमानदारी से उनका हक बनता है। वे अंतिम निर्णय तक उम्मीद भी पाले रहेंगे। वे चाहते हैं कि मंडी धनौरा व्यापारी वर्ग बाहुल्य नगर है वहां से उस वर्ग से उम्मीदवार बनाया जाये और गजरौला से जाट समुदाय के व्यक्ति को उम्मीदवारी दी जाये। यह अत्यंत ईमानदार सुझाव है। बल्कि इस समुदाय के योगदान की दृष्टि से तो यह कुछ भी नहीं।

भाजपा के नीति नियंताओं को गंभीरता से सोचना होगा कि अमरोहा वही जनपद है जहां के इस कृषि प्रधान समुदाय ने कई बड़े आंदोलन चलाये जिनमें चौ. चरण सिंह तथा चौ. महेन्द्र सिंह टिकैत जैसे नेताओं के आंदोलनों को जनाधार मिला। यह वर्ग जिधर झुका है फतह उसी ओर मुड़ी है। यह समुदाय अन्याय के खिलाफ मुखर रहा है  जिसमें अपने हित और अहित की बिल्कुल परवाह नहीं करता।

साढ़े तीन वर्षों से भाजपा नेतृत्व जनपद के जाट समुदाय को बार-बार समायोजन का भरोसा देता आ रहा है जिसकी उम्मीद में कई ऐसे नेता, जिनके सम्मान में गैर भाजपायी दलों में भीड़ जमा हो जाती थी वे भाजपा में दरी बिछाउ बनकर रह गये हैं। यदि इसी तरह चलता रहा तो भाजपा का समर्थक यह समुदाय खुलकर उसके विरोध में उठ खड़ा होगा जिसका परिणाम भाजपा के लिए अच्छा नहीं होगा।

-जी.एस. चाहल.


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