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जनाकांक्षाओं के अनुरूप नहीं होगा आम बजट

इस बजट में सरकार पर चौतरफा चुनौतियों का दबाव है. अगले साल लोकसभा चुनाव भी होना है.

आम बजट प्रति वर्ष की भांति इस बार भी प्रस्तुत होने जा रहा है। बजट को लेकर लोग तरह-तरह की अपेक्षाएं और प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। मोदी का यह बजट अंतिम माना जा रहा है। अगला बजट अगली सरकार बनाएगी। यह कहना आसान नहीं कि अगली सरकार किसकी होगी?

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उद्योगपति, किसान, व्यापारी और बेरोजगार युवक इस बार भी हर बार की तरह यह कुछ ना कुछ रियायत की मांग कर रहे हैं। देश के कई चैनल इसके लिए कई तरह की परिचर्चाएं और डिबेट आदि का आयोजन कर रहे हैं जिसमें लोगों से कई तरह के सवाल भी किए जा रहे हैं।

टीवी चैनल बजट से संबंधित परिचर्चाओं के लिए बड़े शहरों के बड़े लोगों से ही बात कर रहे हैं। दिल्ली, मुम्बई, लुधियाना, सूरत, अहमदाबाद, मुरादाबाद जैसे बड़े नगरों में उद्योगपतियों और बड़े व्यापारियों के बीच ही टीवी एंकर पहुंच रहे हैं। वे छोटे कस्बों तथा गांवों से लगातार दूरी बनाए हुए हैं। जहां बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही है तथा लोगों की क्रय शक्ति लगातार घटती जा रही है। इसका सीधा प्रभाव शहरी व्यापारियों तथा उद्योग-धंधों पर देखने को मिल रहा है। बैंकिंग व्यवस्था भी इसी कारण लड़खड़ा रही है। राजकीय कोष घाटे की चपेट में है।

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सरकार पिछले 4 वर्षों से जनता पर करों का अप्रत्याशित भार लादकर इन समस्याओं के निदान की कोशिश कर रही है। फिर भी विकास का पहिया थमता जा रहा है। जब जनता की जेब में पैसा नहीं है तो वह खरीदारी कैसे करेगी? वह खरीदेगी नहीं तो बाजार में नीरसता-सुस्ती का वातावरण रहेगा। ऐसे में उद्योगों का माल नहीं बिकेगा।

इस बजट में सरकार पर चौतरफा चुनौतियों का दबाव है। अगले साल लोकसभा चुनाव भी होना है। फिर भी नहीं लगता कि यह बजट जन आकांक्षाओं के अनुरूप होगा?

-जी.एस. चाहल.


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