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बैंकिंग घोटाले ने खोल दी आर्थिक बदहाली की पोल

बुरी तरह खस्ताहाल हो चुकी सरकारी बैंकों को अब निजी हाथों में सौंपने की तैयारी शुरू हो गई है.

देश की डांवाडोल आर्थिक स्थिति की हकीकत बैंक घोटालों के खुलने से सबके सामने है। इस खुलासे के बाद से बैंकिंग व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठना शुरू हो गया है। जिन बैंकों में जमा कर लोग अपने धन की सुरक्षा के प्रति निश्चिंत होकर चैन की नींद सोते थे, अब उन्हें बैंकों पर भरोसा नहीं हो रहा। लोग उहापोह में है कि सरकारी बैंकों में पैसा जमा रखा जाए या नहीं। यह बड़ा सवाल है कि देश की आर्थिक मजबूती का ढोल पीटने वाली सरकार के तीन साल में ही देश की आर्थिक रीढ़ कही जाने वाली बैंकिंग व्यवस्था कैसे गड़बड़ा गई?

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गरीबों को प्रधानमंत्री जनधन खाता खोलने के पीछे सरकार का मकसद गरीबों के पैसों से अमीर उद्योगपतियों को धन मुहैया कराना था। यह बात उन्हें अब समझ में आ रही होगी। ऐसे खातों में 13000 करोड़ रुपए से अधिक धन जमा होने का शोर मच रहा था। अब ऐसे अधिकांश खातों में जमा धन जब्त कर उन्हें बंद किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के गजरौला में बैंक ऑफ बड़ौदा की शाखा में इस तरह के डेढ़ हजार खाते कम रकम का बहाना बनाकर बंद करने की खबर है। दूसरी अनेक शाखाओं में भी में भी यही हाल है। क्या गरीबों का धन छल से जमा करके उसे हड़पने वालों के खिलाफ भी कोई जांच होगी? अथवा गरीबों का पैसा अमीरों को देकर देश से भगा दिया जाएगा।

लोगों के पुराने नोटों को बदल कर नए नोट देने के बहाने साल भर तक जिस तरह आम आदमी को नोटबंदी के दौरान खाली हाथ बनाए रखा, वह भी दम तोड़ रही बैंकिंग व्यवस्था को ऑक्सीजन देकर बड़े लोगों को रकम मुहैया कराना ही था। बुरी तरह खस्ताहाल हो चुकी सरकारी बैंकों को अब निजी हाथों में सौंपने की तैयारी शुरू हो गई है। यानी जिन निजी बैंकों को इंदिरा गांधी ने सरकारी बनाकर आम आदमी के लिए खोला था, मौजूदा सरकार ने फिर से उन्हीं हाथों में देने की तैयारी कर दी है। क्या इसे देश को चार दशक पीछे ले जाने वाला कदम नहीं कहा जाएगा? कृषि क्षेत्र उत्पादन में 30 वर्ष पीछे चला गया। जब पूरी दुनिया आगे बढ़ रही है तब हमारा देश पीछे लौट रहा है। क्या प्राचीन संस्कृति के संदेश वाहक वास्तव में हमें वैदिक युग में ले जाना चाहते हैं?

-जी.एस. चाहल.


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