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किसान विरोधी नीतियों से किसानों की आय बढ़ाएगी सरकार?

उर्वरकों, कीटनाशकों, कृषि यंत्रों, ट्रैक्टरों और उनके पुर्जों पर जीएसटी लगाकर कीमतों में भारी वृद्धि की है.

मोदी सरकार की 4 साल की नीतियों और घोषणाओं से देश के लोगों को समझ में आ गया होगा कि वे जिस काम को करने का ढिंढोरा पीटते हैं, हकीकत में उसे उल्टा करते रहे हैं। देश की सबसे बड़ी आबादी जो गांव में रहती है तथा खेती और पशुधन के साथ मजदूरी भी करती है, को बीते चार वर्षों में जितना इस सरकार ने बहकाया है उतना पिछली किसी भी सरकार ने नहीं बहकाया।

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केंद्र सरकार ने बदलाव के बहाने कृषि अनुसंधानों को बंदी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया.

किसानों की आमदनी दोगुनी करने का राग आलापते-आलापते मोदी सरकार का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है और किसानों को उनके कार्यकाल में लागत का डेढ़ गुना तो क्या पूरा भी नहीं मिल पा रहा। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने जो घोषणा पत्र जारी किया उसके पृष्ठ-44 पर किसानों को लागत पर डेढ़ गुना लाभ का वादा किया गया था लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही, उनकी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दिया कि किसानों को लागत पर 50 फ़ीसदी लाभ देना संभव ही नहीं। यह हलफनामा किसान नेता वीएम सिंह द्वारा सुप्रीम कोर्ट में डेढ़ गुना देने का वायदा पूरा करने की मांग के बाद सरकार ने दिया।

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इस हलफनामे की चर्चा को दबाए मोदी सरकार के तमाम नेता 4 वर्षों से बेशर्मी के साथ किसानों की आय बढ़ाने की वकालत करते नहीं थक रहे कि पिछले कुछ समय से तो उसे  दोगुना करने का शोर भी मचाया जा रहा है। जो लोग सर्वोच्च अदालत में लिखित कसम खाकर कह चुके कि किसानों को लागत का 50 फीसदी लाभ नहीं दिया जा सकता, वे लागत पर सौ फीसदी लाभ दिलाने का वादा करके कितना बड़ा झूठ बोल रहे हैं। यह सब आगामी लोकसभा चुनावों में किसानों के वोट हासिल करने का एक और हथकंडा अपनाया जा रहा है।

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उर्वरकों, कीटनाशकों, कृषि यंत्रों तथा ट्रैक्टरों और उनके पुर्जों पर जीएसटी लगाकर उनकी कीमतों में भारी वृद्धि की है। बिजली नलकूपों के बिल लगभग दोगुने तक करके लागत पहले ही डेढ़ गुना से अधिक हो गई तथा कृषि उत्पादों के मूल्य जस के तस हैं  बल्कि कपास का मूल्य प्रति गांठ बाजार में 500 रुपये कम हो गया है। पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े गेंहू उत्पादक राज्य हैं। इन राज्यों में जाने पर पता चला है कि गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष फसल कमजोर है। इससे उत्पादन इस बार कम होने की उम्मीद है। उत्तर प्रदेश इन तीन राज्य में सबसे अधिक गेहूं उत्पादन करता है लेकिन इस बार रकवा घटने और फसल कमजोर होने से यह गेहूं उत्पादन में पिछड़ जाएगा।

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राज्य की योगी सरकार स्वप्नलोक में विचरण कर रही है। उसने इस बार पिछले वर्ष से दोगुना गेहूं खरीद का लक्ष्य तय किया है तथा अधिकारियों से अप्रैल में ही तौल केंद्र स्थापित कर गेहूं खरीद को कह दिया है। हर हाल में लक्ष्य हासिल करने की हिदायत दी है। अखिलेश सरकार ने पिछली बार 37 लाख टन खरीद लक्ष्य रखा था जिसे पूरा नहीं किया जा सका। सत्ता के आनंद में भाव-विभोर पीत वस्त्रधारी योगी से सत्ता भोगी मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यानाथ ने इस लक्ष्य को दोगुने से भी अधिक 80 लाख टन रख दिया है। लगता है योगी जी को अपने राज्य की खेती का अधूरा ज्ञान है। हालांकि केंद्र ने पिछले वर्षों से सबक लेते हुए इस बार गत वर्ष के खरीद लक्ष्य 3 करोड़ 30 लाख टन से घटाकर 3 करोड़ 20 लाख टन रखा है। साथ ही हिदायत भी दी है कि अधिकारी लक्ष्य हासिल करें। लेकिन हमारा दावा है कि कम किया यह लक्ष्य भी सरकार हासिल नहीं कर पाएगी। कारण स्पष्ट है सरकारी नीतियां किसान विरोधी हैं जिसका दुष्प्रभाव सामने आ रहा है।

उर्वरकों, कीटनाशकों, कृषि यंत्रों तथा ट्रैक्टरों और उनके पुर्जों पर जीएसटी लगाकर उनकी कीमतों में भारी वृद्धि की है. बिजली नलकूपों के बिल लगभग दोगुने तक करके लागत पहले ही डेढ़ गुना से अधिक हो गई तथा कृषि उत्पादों के मूल्य जस के तस हैं  बल्कि कपास का मूल्य प्रति गांठ बाजार में 500 रुपये कम हो गया है

किसान और खेती को बढ़ावा देने का ढोल पीटने वाली भाजपा सरकार हकीकत में इसके खिलाफ बेहद उदासीन रवैया अपना रही है। पिछले डेढ़ साल से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में नियुक्तियां नहीं की गयीं। भर्तियां करने वाले बोर्ड में चेयरमैन से लेकर सदस्यों तक के पद खाली हैं। यहां केवल एक सदस्य है। ऐसे में 102 शोध संस्थानों में से 55 संस्थानों का काम ठप है। केंद्र सरकार ने बदलाव के बहाने कृषि अनुसंधानों को बंदी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया। देश का ऐतिहासिक पूसा कृषि अनुसंधान संस्थान भी बिना पूर्णकालिक निदेशक तथा जरूरी वैज्ञानिकों के बिना ही चल रहा है। क्या इसे कृषि को बढ़ावा देने वाला कदम कहा जा सकता है? यह तो खेती को बर्बाद करने की बड़ी साजिश का प्रमाण है।

-जी.एस. चाहल.


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