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आगामी संसदीय चुनाव में किस करवट बैठेगा ऊंट?

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भाजपा के खिलाफ समूचा विपक्ष लामबंदी पर आमादा है. लाख प्रयास पर भी वह टूटने वाला नहीं.

भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व चाहें कुछ भी दावा करे लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में हवा उसके माफिक नहीं बहने वाली। उसे चुनाव में केवल विपक्ष से ही नहीं, बल्कि अपने कई सहयोगियों से भी मुकाबले को तैयार रहना होगा। चुनावी परिणाम भाजपा की दोहरे मोरचे पर मिलने वाली चुनौतियों के खिलाफ तैयारियों पर बहुत कुछ निर्भर करेंगे।

2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में सबसे बड़ा अंतर यह रहेगा कि 2014 में एनडीए के कुनबे में जुड़ने वाले कई दलों में से इस बार उसके खिलाफ मैदान में होंगे। जबकि यूपीए के साथ ऐसे कई दल आ रहे हैं जो 2014 में उससे अलग होकर चुनाव लड़े थे। दूसरे शब्दों में भाजपा के खिलाफ समूचा विपक्ष लामबंदी पर आमादा है। भाजपा के लाख प्रयास पर भी वह टूटने वाला नहीं। यह उनकी मजबूरी है और भाजपा की कार्यशैली ने उसे मजबूत करने का ही काम किया है।

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प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी.
2014 में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के आहवान पर भाजपा ने जो सफलता हासिल की थी, वह कई विधाानसभा चुनावों में भी जारी रही। हालांकि उसके फौरन बाद दिल्ली जैसे राज्य में जहां लोकसभा की सभी छह सीटों पर उसे विजय मिली थी, आम आदमी पार्टी ने विधानसभा चुनावों में भाजपा का पूरी तरह सफाया कर दिया। उधर बिहार में भी उसे भारी पराजय का सामना करना पड़ा। पंजाब में भाजपा-अकाली गठबंधन तीसरे स्थान पर चला गया। लेकिन हरियाणा, असम, यूपी और त्रिपुरा में उसे भारी सफलता मिली जबकि दोनों नेताओं के गृह प्रदेश  गुजरात में उसका ग्राफ गिर गया। कांग्रेस और भाजपा में यहां 60 और 115 सीटों का अनुपात घटकर 80 और 99 तक आ गया।

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद अधिकांश राज्यों में भाजपा विजयी रही लेकिन उसकी इस विजय के बाद यानि अमित शाह के शब्दों में जहां-जहां डबल इंजन की सरकार बनती गयी भाजपा के लिए उत्तरदायित्व बढ़ता गया। हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में डबल इंजन के लगने के बाद भी विकास को गति नहीं मिली, बल्कि रोजगार घटने लगे, उद्योग-धंधे दम तोड़ने लगे, सड़कों का निर्माण तो दूर, पिछली सरकारों द्वारा बनायी सड़कों के गड्ढे तक ठीक नहीं हो पाये।

कृषि और किसान की तरक्की का जमकर शोर मच रहा है लेकिन हर नयी योजना किसानों को मायूस करने का साधन बनती जा रही है। किसानों की फसलों के उचित दाम दिलाना छालावा हो गया है। बिजली दरें, उर्वरकों के दाम, कीटनाशकों और कृषि यंत्रों के मूल्यों में भारी वृद्धि की गयी है। ट्रेक्टरों को गैर-कृषि वाहनों में शामिल कर नया सिरदर्द बढ़ाया गया है।

गलत तरीके से नोटबंदी और जीएसटी लागू कर व्यापारियों तथा नौकरीपेशा लोगों को झंझट में डाल दिया गया है। बैंकों से निवेशकों को समय पर अभी तक पैसे मिलने में परेशानी है। जिन एटीएम में 24 घंटे नकदी उपलब्ध रहती थी, उनमें पैसा ही नहीं मिलता। शिक्षामित्रों, दैनिक वेतनभोगियों तथा संविदाकर्मियों को कई-कई माह तक पैसा ही नहीं मिलता। 17-18 वित्त वर्ष समाप्त हो चुका लेकिन देश को ओडीएफ करने का ढोल पीटने वाली सरकार ने अभी तक शौचालयों के निर्माण की केवल पहली किश्त ही भेजी है। अधिकारी कह रहे हैं, जब पैसा ही नहीं आया तो शौचालय कहां से बनवायें।

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योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव.
उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद मिल गये, जिसका परिणाम भाजपा को सबसे महत्वपूर्ण लोकसभा सीटें छिनवा कर मिल चुका। बंगाल की ममता और वामपंथी भाजपा के खिलाफ एकजुट हो चुके। राजस्थान और बंगाल में भी कांग्रेस के साथ सपा, बसपा और कई दल भाजपा के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। महाराष्ट्र में उसकी प्रमुख शिवसेना उसके खिलाफ मैदान में उतरने की घोषणा कर चुकी। आंध्र में उसकी प्रमुख सहयोगी टीडीपी उससे अलग हो चुकी। तेलंगाना में भाजपा का पहले ही कोई वजूद नहीं। हरियाणा में दो इंजनों की सरकार ने जो तांडव मचाया है उससे किसान, व्यापारी और उद्यमी सभी नाखुश हैं। कश्मीर में क्या हो रहा है? सभी जानते हैं।

वास्तव में भाजपा ने जिस राज्य में क्षेत्रीय दलों से सहयोग कर सरकारें बनायीं, वहीं उसने अपने सहयोगियों को कमजोर करने का प्रयास किया है। शिवसेना और तेलगू देशम पार्टियों के नेता इसे अच्छी तरह समझ गये और समय आते ही भाजपा से नाता तोड़ने का फैसला लिया। उधर कांग्रेस के कुनबे से छिटके सपा, बसपा, राकांपा, टीएमसी, आदि फिर से भाजपा के खिलाफ उसके साथ आने वाले हैं। एक-दूसरे के प्रबल विरोधी सपा-बसपा की एकजुटता भी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की नीतियों के कारण ही हुई है। इसे भाजपा का भय भी कहें तब भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। इसमें तनिक भी संशय नहीं कि 2018 में भाजपा विरोधी अभियान की शुरुआत हो चुकी।

-जी.एस. चाहल.