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अमरोहा के मुसलमान बनाते हैं शुभ होली की रंगीन टोपियाँ, दूर देशों तक जाती हैं

देश भर में अमरोहा के मुस्लिम परिवारों के हाथ की बनी होली टोपी पहन कर हिन्दू भाई होली मनाते हैं.

देश की राजनीति में भले ही हिंदू मुस्लिम के नाम पर चुनाव  होते हो सांप्रदायिकता कितनी भी बढ़ जाए लेकिन शांति  नगरी अमरोहा ने हमेशा इस एकता और अखंडता को मज़बूत और स्थिर रखा है, कला,रंगमंच. साहित्य, हिकमत सहित असंख्य विधाओं ने अमरोहा की अद्वित्य पहचान बनाई है अमरोहा नगर जो शताब्दियों से एकता एवं सद्भाव के लिए प्रसिद्ध है।

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अमरोहा में होली की टोपी बनाता एक कारीगर.

अमरोहा के कुछ मुस्लिम परिवारों के लोग अपने हिन्दू भाइयों के त्यौहार होली पर शुभ होली की रंगीन टोपी बनाकर एकता और अखंडता की उदहारण प्रस्तुत करते हैं न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी यह टोपियां भेजी जाती हैं, देश भर में अमरोहा के मुस्लिम परिवारों के हाथ की बनी शुभ होली की टोपी पहन कर हिन्दू भाई होली मनाते हैं। यह अमरोहा नगर के लिए गौरव की बात है। यह मुस्लिम परिवार कई महीने पहले ही होली की टोपियों की तैयारियों में लग जाते हैं। अमरोहा के एक विशेष परिवार के लोग जो खुद को मुग़ल बताते हैं कम से कम डेढ़ दो शताब्दियों से रंगीन टोपी बनाते हैं और हर वर्ष शुभ होली की टोपियां बनाकर अपने पुरखों की परंपराओं को सहेजे हुए हैं।

यदि हम अमरोहा के इतिहास पर ध्यान दें तो यह नगर ढाई हज़ार वर्ष से भी अधिक पुराना है। महमूद अहमद अब्बासी ने अपनी किताब 'तारीख अमरोहा' में लिखा कि अमरोहा को 474 ईसा वर्ष पूर्व हस्तिनापुर के राजा अमरजोध नेअपनी बहन अंबा रानी के नाम से अमरोहा का नाम अमरौवनं यानी आमों के बाग रखा था। उसी के साथ नौगावां रोड पर स्थित गांव गजस्थल भी इसी समय बसाया गया था। हिन्दी में गज अर्थात हाथी और स्थल अर्थात थान। यह गांव हाथियों के थान के रूप में प्रयोग किया जाता था जो आज भी गजस्थल नाम से प्रसिद्ध है। दिल्ली के मुगल शासकों के सरकारी आदेशों( जो अरबी और फ़ारसी भाषा में है ) में भी अम्ब्रोहा अर्थात अमरोहा दर्ज है। प्रसिद्ध घुमक्क्ड़ इब्ने बतूता ने भी अपने यात्रा संस्मरण में अमरोहा का भरपूर उल्लेख किया है। यहां के लोगों ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में अपना महत्व और देशभक्ति का अहसास कराया था। 21 मई 1857 को जब मेरठ में स्वतंत्रता के मतवालों ने आज़ादी का बिगुल बजाया तो दो दिन बाद अमरोहा के स्वतन्त्रता सेनानियों ने यहां की तहसील का खज़ाना लूट लिया था और अंग्रेजी पुलिस के दो सिपाहियों को मार डाला था। उनकी क़ब्रें आज भी चौकी मछरठा के सामने मौजूद हैं।

यह आंदोलन सफल न हो सका था क्योंकि कुछ देशद्रोहियों ने ही इस आंदोलन को पलीता लगा दिया था, लेकिन इस विद्रोह के आरोप में यहां के हजारों परिवारों को अपने जीवन का बलिदान करना पड़ा। अपनी जायदादें जब्त करानी पड़ी थीं। विशेष रूप से गुलज़ार अली और शब्बीर अली निवासीगण मोहल्ला दरबारकलाँ अमरोहा के परिवार को काफ़ी यातनाएं सहन करनी पड़ी थीं। परन्तु अथक प्रयासों के बाद भी अंग्रेज़ उन को पकड़ नही पाए थे। इसी प्रकार 1947 के स्वतंत्रता आंदोलन में अमरोहा की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। यहाँ के लोगों ने जहाँ देशभक्ति को अपने जीवन उद्देश्य बनाया। दूसरी ओर यहां के लोगों ने हस्त शिल्प में भी नाम कमाया है, जैसे रुई धुनने की मशीन का अविष्कार अमरोहा के मिस्त्री एजाज़ ने किया था। तो लकड़ी के रथ बनाने में धांदू सैफी ने अपनी योग्यता दिखाई थी। इसी प्रकार होली की रंगीन टोपियां अमरोहा के मुसलमान बनाते हैं और पूरे देश में होली खेलते समय प्रयोग होती हैं। यहाँ के सूफी संतों की भी लंबी सूची है जिनमें हजरत शाह विलायत, भूरे खां शहीद, नसरूद्दीन साहिब, बाबा गंगा नाथ, वासुदेव तीर्थ सहित बहुत से सूफी संत यहां विश्राम कर रहे हैं। अमरोहा जो मुसहफ़ी अमरोहवी, कमाल अमरोहवी, रऊफ अमरोहवी, रईस अमरोहवी, जॉन एलिया, हयात अमरोहवी, कौसर उल क़ादरी, गौहर अमरोहवी जैसे शायरों साहित्यकारों ,आलोचकों, हकीमों की जन्म स्थली अमरोहा है। यहां का राजनीतिक नेतृत्व जहां मौलाना हिफज़ुल रहमान, मौलाना इसहाक संभली, चेतन चौहान, राशिद अल्वी, शराफत हुसैन रिजवी, तक़ी हादी, वेद राम कुमार, आचार्य कृपलानी जैसे लीडरों ने किया तो मुंशी प्रेमचंद जी, राम लाल भाटिया फ़िक्र तौंसवी, मुजतबा हुसैन, कन्हैया लाल कपूर जैसे सैंकड़ों साहित्यकारों ने यहां के कार्यक्रमों में भाग लेकर अमरोहा को गौरवंतित किया है।

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कुछ इस तरह तैयार होने के बाद रखी जाती है होली की टोपियाँ.

अमरोहा के लगभग आधा दर्जन परिवार डेढ़ दो सौ वर्षों से होली की रंगीन टोपियों में रंग भरने का कार्य कर राष्ट्रीय एकता और अखंडता की उदाहरण बन खुशी महसूस करते हैं। वैसे तो यह कार्य उनके लिए सीजनली है, लेकिन इन परिवारों का कहना है कि शांति नगरी अमरोहा की सदैव भाईचारे की मिसाल को कायम रखा जाये ताकि आने वाली नस्लें हमारी परम्पराओं को याद करते रहें। यह परिवार शुभ होली की रंगीन टोपी बनाने की शुरुआत कई महीने पहले ही कर देते हैं जिससे समय पर ऑर्डर पूरा कर सकें। इस परिवार के एक कारीगर ने बताया कि हमें अब इस धंधे में कोई विशेष लाभ नहीं परंतु पारिवारिक विरासत को निभा रहे हैं ताकि एकता की परंपरा कायम रहे।

टोपी बनाने में महिला और पुरुष दोनों का बराबर सहयोग रहता है। लगभग छः माह पहले मलमल की रंग-बिरंगी धोतियों पर कल्फ़ और रंग चढ़ाया जाता है। सूखने के बाद उन पर प्रेस की जाती है। फिर कटिंग मास्टर द्वारा उन में से विभिन्न माप की दर्जनों टोपी काट कर आगे बैठी महिला को सौंपता है जो कच्ची सिलाई कर अन्य मशीन वाली महिला के हवाले करती है जो उसपर पक्की सिलाई कर आगे बढ़ा देती है। अगले चरण में काम कर रही महिला पुरुष इन टोपियों पर चारों ओर लेई या गोंद से काग़ज़ की रंगीन झालर लगाते हैं। एक अन्य कारीगर इन टोपियों पर रंग बिरंगे ठप्पे लगा कर सजाता है। अभी कार्य समाप्त नहीं हुआ है। ठप्पा लगाने वाले के पास बैठा कारीगर इन टोपियों की साइज़वार गिनती कर बीस-बीस के बंडलों में जमा करता है। इस प्रकार पांच बंडल का एक-एक सैकड़ा टोपी का पैकेट बनाकर बड़े-बड़े कार्टूनों में भर कर देश-विदेश को भेजा जाता है। लगभग आधा दर्जन हाथो से गुजर कर टोपी सिर तक पहुंचती है।

होली से पहले ही इन टोपियों की बिक्री आरम्भ हो जाती है। उन्होंने ये भी बताया कि हमें इस काम से बहुत कम मजदूरी मिलती है जबकि बिचौलिये इस में बहुत कमाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र या राज्य सरकारा इस राष्ट्रीय एकता के उद्योग को घरेलू उद्योग का दर्जा दें। ​हमें बैंकों से कम ब्याज पर कर्जा दिलाया जाए ,ताकि आर्थिक रूप सशक्त होकर यह काम निश्चिन्त हो कर सकें और समय पर टोपियों के ऑर्डर को पूरा कर सकें। अभी इधर-उधर से उधार लेकर माँग पूरी करनी पड़ती है, परंतु हम अमरोहा की इस उत्कृष्ट परंपरा को हमेशा कायम रखना चाहते है ताकि सांप्रदायिक शक्तियां अपने प्रयासों में सफल न हो सकें। उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया और राजनेता यदि हमारे मामले को शासकों तक पहुंचा दें हैं, तो संभव है कि सरकारें हमारी सुध भी ले लें।

-डॉ. महताब अमरोहवी.

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