Header Ads

खाली जेब के खरीददारों के भरोसे मोदी और योगी का बाजार

चार साल में देश की आर्थिक बदहाली के कारण आम आदमी की जेब खाली है.

लोकसभा की 80 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश पर आगामी लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सबसे अधिक जोर लगाएगी। इस प्रदेश ने जहां सबसे अधिक प्रधानमंत्री दिए हैं वहीं इसमें बहुमत के बिना केंद्र में सत्ता पर कब्जा पाना भी नामुमकिन है। केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने  बीते चार वर्षों में इस राज्य में सड़कों, स्वास्थ्य, कृषि तथा बेरोजगारी जैसी मूल समस्याओं के समाधान के लिए कुछ नहीं किया। ऐसे में चुनाव में बचे एक साल से भी कम समय में वह क्या कर सकेगी, लोगों को दिखाई दे रहा है। भाजपा का प्रयास है कि वह लोगों को एक बार फिर से कोरे आश्वासनों के सहारे अपने पक्ष में मोड़े। इसका सबसे सरल उपाय यहां के बहुसंख्यक वर्ग का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर लगाए रखना है। लोकसभा और विधानसभा में यह तरीका कारगर सिद्ध हो चुका है। अभी भी यह भावना यहां जीवित है, भले ही विकास का मुद्दा उसे किसी हद तक शिथिल करने की ओर बढ़ा है।

narendra-modi-yogi-adityanath
नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ. (फाइल फोटो).

मेरठ में आरएसएस के राष्ट्रोदय के नाम से हिंदू कट्टरवाद का उद्घोष कर मोहन भागवत ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को धार देने की शुरुआत कर दी है। इससे स्पष्ट हो गया है कि भाजपा नेतृत्व ने एक बहुत ही सोची समझी रणनीति के तहत आरएसएस को चुनावी जमीन मजबूत करने को हरी झंडी दे दी है। खाकी नेकर से खाकी पैंट में आया यह संगठन भगवा टोली को आगे कर चुका।

उधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ में देश के उद्योगपतियों के साथ बड़ा समारोह कर प्रदेश की जनता में यह संदेश दे रहे हैं कि यहां बहुत जल्दी औद्योगिक इकाइयां स्थापित हो जाएंगी, जिससे प्रदेश में रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। इस समारोह पर ही करोड़ों रुपए खर्च कर दिए गए। सरकार की कठपुतली बने मीडिया में बड़े विज्ञापन देकर जनता की गाढ़ी कमाई को पीत वस्त्रधारी मुख्यमंत्री पानी की तरह बहा दी।

इस तरह के समारोह करने से यदि जनता की तकदीर बदलती तो चार सालों से केन्द्र सरकार बार-बार जाने कितने कार्यक्रम कर चुकी। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अनेकों देशों के मुखियाओं के स्वागत में जाने कितने धन को स्वाहा कर चुके, अब तक पूरे देश की कायापलट हो गई होती। यह सब कार्यक्रम चुनाव जीतने को जनता को बहकाने का ही साधन है।

आम आदमी भी अच्छी तरह जानता है कि उसकी जेब में पैसा होगा, तो वह बाजार जाएगा। वह बाजार जाएगा तो बाजार उद्योगों तक पहुंचेगा और उद्योग उसकी मांग पर उत्पादन बढ़ाएगा। विकास की यह श्रृंखला देश की जीडीपी को ऊंचा उठाने का सूत्र है। क्या ऐसा हो रहा है? उत्तर है नहीं। यहां इसके विपरीत कदम उठाए जा रहे हैं।

चार साल में देश की आर्थिक बदहाली के कारण आम आदमी की जेब खाली है। उसकी क्रय शक्ति खत्म होती जा रही है। उसने बाजार में जाना बंद कर दिया है। इससे व्यापारी हाथ पर हाथ धरकर बैठे हैं। उनका माल नहीं बिक रहा। ऐसे में व्यापारी उद्योगों से माल नहीं खरीद पा रहे। नासमझी और गलत तरह से की गई नोटबंदी के दुष्परिणाम इसमें सबसे बड़ा कारण हैं। अनाप-शनाप जीएसटी लगाना दूसरा बड़ा कारण है। कई अन्य कारण भी हैं जिससे आम आदमी का जीवन दूभर हो गया है।

उद्योगों का माल न बिकने से उत्पादन गिर रहा है तथा छोटी और मझोली हजारों इकाइयां बंद हो गयीं। इससे लाखों लोग बेरोजगार हो गए। जब चालू उद्योगों का ही माल नहीं बिक रहा, तो सूबे में नए उद्योग कोई क्यों लगाएगा? माल की खपत के लिए खरीददार चाहिए। मोदी और योगी शोर मचा रहे हैं, भारत सवा सौ करोड़ का देश है। यहां बड़ा बाजार है। इसलिए भारत में उद्योग लगाकर उत्पादन बढ़ाएं।

इन संतानहीन नेताओं को यह पता नहीं कि जब संतान वालों की जेब खाली है तो वे खरीददारी कैसे करेंगे? खाली जेब खरीदारों से बाजार गुलजार होने के सपने देखने वालों को शेखचिल्ली के शागिर्द मानिए या  सहोदर लेकिन बड़ों का कहना है कि नासमझ से दुश्मनी और दोस्ती दोनों ही खतरनाक हैं।

-जी.एस. चाहल.

Gajraula Times  के ताज़ा अपडेट के लिए हमारा फेसबुक  पेज लाइक करें या ट्विटर  पर फोलो करें. आप हमें गूगल प्लस  पर ज्वाइन कर सकते हैं ...