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विपक्षी दलों के गठजोड़ से किसे ख़तरा?

election-2018
इस दौरना कई दल इधर से उधर होते रहेंगे तथा भारतीय लोकतंत्र की निरंतरता बनी रहेगी..

विविध सांस्कृतिक विचारधाराओं और साम्प्रदायिक एवं जातीय समूहों के संगम का नाम ही भारत है। ऐसे में यदि किसी राज्य अथवा केन्द्र में बहुदलीय साझा सरकार बनती है तो एक दलीय और एकल वैचारिक संस्कृति की सरकार से वह अधिक बेहतर है। इस समय भाजपानीत एनडीए की केन्द्र सरकार भी तीन दर्जन दलों की संयुक्त सरकार है।

2014 में 28 दलों के संयुक्त मोरचे ने भाजपा की अगुआई में केन्द्र में भारी बहुमत से सरकार बनायी। इसके बाद 2018 में भाजपा के नेतृत्व वाले राजग में बारह नये दल और मिल गये लेकिन बाद में इनमें से चार दल अलग हो गये जिनमें टीडीपी प्रमुख है। अभी भी राजग में 36 दल शामिल हैं। इससे पहले दस वर्ष तक लगातार केन्द्र की सत्ता में काबिज यूपीए सरकार भी कई दलों की साझा सरकार थी। अधिकांश राज्यों में भी मिलीजुली सरकारें हैं। ऐसे में यदि राजग के खिलाफ विपक्ष के 22 दलों के नेता एक साझा मोरचा बनाने की ओर बढ़ रहे हैं तो उससे किसी को तकलीफ क्यों? भाजपा तथा उसके कई भक्त चैनल इस मोरचे पर तरह-तरह के सवाल गढ़ कर इसे बेमेल खिचड़ी, कहीं की ईंट- कहीं का रोड़ा तथा भानुमती के कुनबे की संज्ञा तक दे कर आलोचना कर रहे हैं। विधानसभा चुनावों में विपक्ष ने एकजुट होकर जिस तरह भाजपा के मुंह तक पहुंचा सत्ता का निवाला झपट लिया है उससे भाजपा को करारा झटका लगा है। उसने ऐसा सपने में भी नहीं सोचा था।

यह सभी जानते हैं कि राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती। 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा लगातार दो बार बुरी तरह धूल चाटने से बेहाल हो गयीं। उधर उत्तर प्रदेश में बुरी तरह दोनों चुनावों में पराजित कांग्रेस और रालोद की नींद हराम हो गयी। 

बीते गोरखपुर और फूलपुर के संसदीय उपचुनाव में सपा-बसपा ने पुरानी बातें भूल सत्ता में वापसी के लिए एकता का फार्मूला अपनाकर देखा जिसमें रालोद ने बिना मांगे समर्थन किया। कांग्रेस मैदान में तो उतरी मगर खामोश पड़ गयी। बुआ-भतीजा की एकता का प्रयोग सफल रहा तथा भाजपा के दिग्गजों के दोनों गढ़ ध्वस्त करने में यह फार्मूला दमदार निकला। कैराना और नूरपुर में भी यही फार्मूला अपनाया गया है। जिसका परिणाम 31 मई को मिल जायेगा।

लोकसभा के 2014 के चुनावों के बाद ऐसे अधिकांश राज्यों में भाजपा जीती है या जोड़तोड़ से सरकारें बनायीं जहां पहले उसकी सरकारें नहीं थीं, लेकिन जिन राज्यों में उसकी सरकारें थीं वहां वह पराजित रही या उसकी सीटें घटीं। ऐसे में लोकसभा चुनाव से पूर्व राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे वहां भाजपा की पराजय की संभावना अभी से व्यक्त की जा रही है। यदि यह संभावना हकीकत में बदली तो 2019 का संसदीय चुनाव भाजपा के लिए खतरे की घंटी सिद्ध होगा। कई लोग तो कहने लगे हैं कि यदि कैराना और नूरपुर के नतीजे भाजपा के खिलाफ गये तो लोकसभा चुनाव हकीकत में  दिसंबर में करा लिए जाएंगे।

कई भाजपा प्रवक्ता और भक्त चैनलों के एंकर परिचर्चाओं में विपक्षी नेताओं से पूछ रहे हैं कि क्या वे मोदी से डर कर एकजुट हो रहे हैं, जबकि भाजपा पहले से ही तीन दर्जन दलों का गठजोड़ तैयार कर सत्ता में है। विपक्ष के 22 दलों की एकजुटता को वे पवित्र गठजोड़ तक कहकर खीझ उतार रहे हैं। और उससे भी बड़े गठजोड़ पर खामोश हैं, उनका गठजोड़ अपवित्र है! 

देश के नेताओं की कुर्सी की भूख जीते जी खत्म नहीं होती बल्कि आयु बढ़ने पर वह और प्रज्जवलित होती जाती है। जब ये नेता जनता के द्वारा कुर्सी से उतार दिये जाते हैं तो उसे फिर से पाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार रहते हैं। देशभक्ति की ध्वज वाहक भाजपा को ऐसे में अलगाववाद का राग अलापने वाली पीडीपी से गलबहियों में भी अद्भुत आनंद का आभास होता है और एक-दूसरे की धुर विरोधी सपा और बसपा के शीर्ष नेतृत्व में बुआ-भतीजा का रिश्ता बन पड़ता है। दूसरी ओर सत्ता के आनन्द में शिवसेना भाजपा की सरकार होते हुए भी अपने मतों में सेंधमारी के खतरे से भयभीत बार-बार अलगाव का राग अलाप अपने अस्तित्व की रक्षा की कोशिश में पेंडुलम की तरह इधर-उधर घूमती रहती है।

संसदीय चुनाव तक कई मोरचे और गठबंधनों के बनने-बिगड़ने का सिलसिला चलता रहेगा। जिसमें कई दल इधर से उधर होते रहेंगे तथा भारतीय लोकतंत्र की निरंतरता बनी रहेगी।

-जी.एस. चाहल