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दलित मंत्री बने तो अमरोहा का किला फतह कर सकती है भाजपा

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यदि भाजपा स्थिति का सही आकलन नहीं कर पायी तो मजबूत उम्मीदवार के बाद भी उसे विजयी नहीं मिलेगी.

आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा की जय पराजय दलित और जाट-समुदायों पर बहुत कुछ निर्भर होगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ये दोनों समुदाय निर्णायक सिद्ध होंगे। भाजपा सरकार विशेषकर केन्द्र सरकार के रवैये से इन दोनों समुदायों में असंतोष है। अमरोहा लोकसभा सीट पर भी भाजपा उम्मीदवार इनके बिना विजय हासिल नहीं कर पायेगा। सपा-बसपा गठबंधन के कारण यह चुनाव भाजपा के लिए और भी जटिल हो गया है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ ही भाजपा के चुनाव प्रभारियों को इन दोनों समुदायों की नाराजगी दूर करने के उपाय अभी से करने की जरुरत है ताकि यह चुनाव मजबूती से लड़ा जा सके।

अमरोहा लोकसभा सीट से सपा सरकार के दौरान महबूब अली, कमाल अख्तर, मौलाना आब्दी और मदन चौहान को मंत्री बनाया गया। कई और छुटभैये भी दर्जा राज्यमंत्री के पद से नवाजे गये। बसपा शासन में भी यहां से गंगासरन खड़गवंशी, सोमपाल सिंह तथा डा. संजीव लाल जैसे लोग मंत्री रहे।

परंतु भाजपा ने यहां से केवल चेतन चौहान को मंत्री बनाकर यह संदेश दिया कि भाजपा केवल ठाकुर और ब्राह्मणों को महत्व देती है। उसे दलित और पिछड़ों के हितों से कोई लगाव नहीं। मुख्यमंत्री ठाकुर हैं तो यहां से एकमात्र ठाकुर को मंत्री बनाया गया है।

भाजपा के लिए इस सीट पर दलितों को साथ लाने के लिए रिकार्ड मतों से विजयी धनौरा विधायक राजीव तरारा को अविलम्ब मंत्रीमंडल में शामिल कर अपनी भूल सुधारनी चाहिए। इससे केवल अमरोहा ही नहीं बल्कि पूरे मुरादाबाद मंडल में संदेश जाएगा कि भाजपा दलितों को सत्ता में समान भागीदार बना रही है। यह समुदाय मुस्लिमों और यादवों को प्राथमिकता देने वाली सपा से गठबंधन करने वाली बसपा के बजाय भाजपा से जुड़ा रह सकता है।

प्रदेश और केन्द्र में भाजपा ने ब्राह्मणों और ठाकुरों को दूसरे समुदायों से अधिक और प्रभावशाली मंत्रालय दिये हैं। दलितों और जाट समुदाय को लगभग हाशिये पर डाल दिया है। कई दलित मंत्री, सांसद और नेता अपनी उपेक्षा का खुलेआम इजहार कर रहे हैं। इनमें सावित्रीबाई फुले, उदित राज तथा राजभर के नाम प्रमुख हैं।

अमरोहा लोकसभा सीट की पांच विधानसभाओं में से एक पर चौहान, एक पर जाटव, एक पर खड़गवंशी तथा एक पर जाट विजयी रहे। लेकिन इनमें से चौहान को कैबीनेट मंत्री बनाया जबकि मुख्यमंत्री समेत कई अन्य ठाकुर पहले ही मंत्रीमंडल पर प्रभाव बनाए हुए थे। यहां से शेष तीन विधायकों में से किसी को भी मंत्री नहीं बनाये जाने से तीनों बिरादरियों में यह धारणा है कि भाजपा में उनकी उपेक्षा है।

पांच में से चार विधानसभाओं पर भाजपा को विजय दिलाने में जाटव और जाट अपने सजातीय नेताओं चौ. अजीत सिंह तथा कुमारी मायावती को छोड़ भाजपा के साथ आए, यह बड़ी बात थी। ऐसे में चौहान को मंत्री बनाने के बजाय दलित, खड़गवंशी या जाट विधायक में से किसी एक को या तीनों को भी यह पद दिए जा सकते थे अथवा उन्हें दर्जामंत्री दिया जा सकता था।

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चेतन चौहान, महेन्द्र सिंह खड़गवंशी और राजीव तरारा इन तीनों में वैसे भी राजीव तरारा का हक बनता है। उन्होंने सबसे भारी अंतर से जीत हासिल की, वे इनमें सबसे अधिक पढ़े-लिखे हैं तथा बसपा के वोट बैंक को साधने के लिए भी उनका मंत्री बनना भाजपा के हित में है। उन्होंने पहली बार में अपने दम पर बसपा के डा. संजीव लाल तथा सपा के जगराम सिंह जैसे दोनों मंत्रियों को धराशायी किया। उनके चुनाव में क्षेत्रीय नेताओं ने भी खास दिलचस्पी नहीं ली थी। जबकि जिलेभर के भाजपा के तमाम ताकतवर नेता चेतन चौहान के चुनाव में तन मन धन से जुटे। तब भी वे भाजपा के तीनों विजेताओं में सबसे कम अंतर से जीत प्राप्त कर पाए।

यदि भाजपा यहां की स्थिति का सही आकलन नहीं कर पायी तो यहां से कितना भी मजबूत उम्मीदवार मैदान में उतारे उसे विजयी नहीं बना पाएगी।

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-टाइम्स न्यूज़ अमरोहा.