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हराने के लिए मतदान करते हैं, जिताने के लिए नहीं

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लोकतंत्र की यही खूबी कई बार विकल्पहीन वातावरण में स्वस्फूर्त विकल्प को जन्म देती रही है.

उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बुरी तरह पराजित हुई सपा और बसपा को अच्छी तरह से सबक मिल गया कि यदि वे एक साथ भाजपा के खिलाफ खड़े नहीं हुए तो राजनीतिक पटल से गायब हो जाएंगे। फूलपुर संसदीय उपचुनाव में उनकी इस एकता ने वास्तव में गजब के परिणाम देकर आगामी संसदीय चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन का रास्ता साफ कर दिया था। वैसे भी अब इसके अलावा बुआ-भतीजे के पास कोई विकल्प भी नहीं। सूबे में संसदीय चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनावों में जिस आंधी की तरह भाजपा ने सफलता हासिल की थी अब उसके नेताओं की नींद उड़ चुकी। विधानसभा चुनाव तक आते आते सपा-बसपा का गठबंधन कायम रहेगा या नहीं इसका जवाब आसान नहीं, लेकिन इसमें अब कोई संदेह नहीं कि संसदीय चुनाव में यह रिश्ता मजबूती के साथ भाजपा के सामने खड़ा रहेगा। इसी के साथ यह कहने में भी कुछ गलत नहीं होगा कि इन दोनों दलों के साथ भाजपा विरोधी कांग्रेस और रालोद मजबूती के साथ खड़े रहेंगे। कई दूसरे दलों के नेता भी इनका साथ दें तो कोई आश्चर्य नहीं।

उत्तर प्रदेश देश का वह राज्य है जहां से होकर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता निकलता है। दूसरे राज्यों को छोड़िए यदि अकेले उत्तर प्रदेश में ही भाजपा विरोधी सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद मजबूती के साथ लामबंद होकर चुनाव में डटे गए तो भाजपा का 2019 की सत्ता तक पहुंचने का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा। दूसरों के सिर अपनी विफलताओं का ठीकरा फोड़ने में अब तक सफल रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए मतदाताओं को फुसलाना अब पहले जैसा सरल नहीं होगा।

प्रधानमंत्री बनने से पूर्व नरेंद्र मोदी तथा उनके जोड़ीदार अमित शाह देश में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद और घोटालों को खत्म करने के लिए केंद्र की सत्ता चाहते थे। उन पर भरोसा कर लोगों ने केंद्र की सत्ता सौंपी। बाद में उन्होंने गैर भाजपा शासित प्रदेशों की सरकारों के सिर सारी समस्याओं का ठीकरा फोड़ वहां भी भाजपा को सत्ता की मांग की। जनता ने अधिकांश राज्यों में दोनों नेताओं पर भरोसा कर भाजपा को सत्ता की चाबी सौंप, गेंद उसके पाली में डाल दी। ऐसे में हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, असम, राजस्थान त्रिपुरा जैसे राज्यों में भाजपा का भगवा लहराया।

इसके विपरीत इन दोनों नेताओं की नाक के नीचे दिल्ली की जनता ने भाजपा को संसदीय चुनाव की भारी जीत के बाद विधानसभा चुनाव में बिल्कुल नकार दिया। पंजाब में भाजपा गठबंधन पराजित हुआ। बंगाल में भी भाजपा को नापसंद किया गया। बिहार में भाजपा विरोधी महागठबंधन की विजय हुई। जिसे बाद में जेडीयू ने भाजपा के सहयोग से तोड़ भाजपा से हाथ मिला कर सरकार बनाई। गुजरात में भी भाजपा की लोकप्रियता गिरी। भले ही भाजपा और उसके सहयोगी दलों की अधिकांश राज्यों में सरकार है लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा से इन राज्यों के लोग उन्हीं सवालों के जवाबों को मांगेगे जिन सवालों को दोनों चुनावों में जीत मिलने पर हल करने का भरोसा दिलाया था।

मतदाता पूछेंगे क्या बेरोजगारी खत्म या कम हुई? क्या भ्रष्टाचार कम हुआ? क्या आतंकवाद पर काबू पाया गया? क्या गरीबी घटी? महिलाओं और बच्चियों पर अत्याचार क्या कम हो गए? कश्मीर समस्या और राम मंदिर विवाद का क्या हल निकला? किसानों और मजदूरों की समस्याओं का समाधान क्यों नहीं हुआ? इनके अलावा भी मतदाताओं के सवालों की सूची बहुत लंबी है और चुनाव आने तक उसमें और भी इजाफा होगा। लोग आकलन कर रहे हैं कि 5 साल में वह आगे बढ़े पीछे गए?

दूसरी ओर सत्ता से वंचित हुए नेता और विपक्षी दल एकजुट होकर जन समस्याओं को लेकर उसी शैली में हमला बोलने को तैयार हैं जिसके बल पर भाजपा ने उन्हें मात दी थी। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र तथा गुजरात जैसे राज्यों में जहां भाजपा लगभग सारी सीटों पर विजयी रही थी इन सभी राज्यों में उसे भारी नुकसान होगा। जिसके कारण 2019 में उसका सत्ता तक पहुंचना नामुमकिन होगा। इसके लिए विपक्ष की खूबियां नहीं बल्कि भाजपा की नाकामियां उत्तरदाई होंगी।

वैसे भी हमारे देश का मतदाता जिताने के लिए नहीं बल्कि हराने के लिए जोर से मतदान करता है। हमारे देश के लोकतंत्र की यही खूबी कई बार विकल्पहीन वातावरण में स्वस्फूर्त विकल्प को जन्म देती रही है। ऐसी खूबी ने देश की ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर कर ऐसा विकल्प पेश कर दिया जिसने देश को अल्पकाल में ही आर्थिक भंवर में झोंक दिया। उत्तर प्रदेश में कभी कांग्रेस को हराने, कभी बसपा को हराने और कभी सपा को हराने के लिए मतदाता लामबंद होते रहे हैं। देश में तो अभी से भाजपा को हराने की हवा चल पड़ी है और अपनी आदत के मुताबिक यह कोई नई समझ रहा कि इससे बेहतर कौन होगा जिसे सत्ता सौंपी जाए। कोई भी आए, बस जो कुर्सी पर बैठा है, वह हटना चाहिए।

-जी.एस. चाहल.