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कैराना में भाजपा बनाम विपक्ष में कांटे की टक्कर, करो या मरो की नीति पर जूझ रहे दोनों पक्ष

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कैराना संसदीय तथा नूरपुर विधानसभा सीटों का उपचुनाव बेहद दिलचस्प मोड़ पर है.

इस संसदीय सीट पर होने वाले उपचुनाव के परिणाम भाजपा और उसके प्रतिद्वंदी संगठित विपक्ष के लिए जितने महत्वपूर्ण हैं उतनी ही संजीदगी से इस परिणाम पर उत्तर प्रदेश की जनता का ध्यान है। राजनीतिक मोरचों से लेकर राह चलते आम आदमी तक पता लगाना चाहते हैं कि आखिर कैराना में ऊंट किस करवट बैठेगा? ताजा हालात और लोगों के बीच पहुंचने पर पता चलता है कि यहां दोनों पक्षों में आमने-सामने की टक्कर है लेकिन सारा दारोमदार जाट मतदाताओं पर निर्भर लग रहा है। यदि इनमें से पचास फीसदी मतदाता भी रालोद की ओर मुड़ गये तो रालोद की फतह सुनिश्चित है। यह रालोद प्रमुख चौधरी अजीत सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी की चुनावी रणनीति पर निर्भर करेगा कि वे अपनी बिरादरी को इस बार कहां तक मनाने में सफल होते हैं?

इस सीट पर दलित मतदाता प्रदेश में भाजपा से असंतुष्ट हैं। तमाम दलित नेता, जिनमें से कई भाजपा में मंत्री, सांसद और विधायक हैं पिछले दिनों दलितों के प्रति भाजपा के रवैये की खुलकर आलोचना कर चुके हैं। ऐसे में भाजपा को उनके समर्थन पर सवालिया निशान है। दूसरी ओर इसका भी स्पष्ट संकेत नहीं है कि वे रालोद उम्मीदवार के साथ ही जायेंगे। बसपा सुप्रीमो मायावती सपा के साथ खुलकर हैं और कर्नाटक में विपक्षी एकता में भाजपा के खिलाफ भी खड़ी हैं लेकिन कैराना में उन्होंने अभी तक रालोद उम्मीदवार का खुलकर समर्थन नहीं किया है। रालोद नेता मानते हैं कि भाजपा का विरोध ही उनके उम्मीदवार का मूक समर्थन है।

कैराना चुनावी नब्ज की पकड़ के लिए एक बात महत्वपूर्ण है। इस सीट का लगभग नब्बे फीसदी मतदाता ग्रामीण परिवेश से है जिसमें अस्सी फीसद मतदाता खेती से जुड़े हैं। उनमें भी सभी मुख्य रुप से गन्ना उत्पादक हैं। डीजल और बिजली की दरों में बेहताशा इजाफे, गन्ना भुगतान न मिलने, उर्वरकों, कृषि यंत्रों और कीटनाशकों की भारी मूल्य वृद्धि, चुनाव पूर्व सभी किसानों के कर्जे माफी के वायदे से पीछे हटने आदि ऐसे कारण हैं जिनसे यहां के किसानों में भाजपा के खिलाफ रोष है।

इन किसानों में यहां जाट, मुस्लिम, गूजर, ब्राह्मण, सैनी आदि सभी वर्गों के लोग हैं। चार साल में केन्द्र सरकार ने केवल किसानों पर टैक्स आदि का भार ही डाला है, किसी भी सम्सया के समाधान को कोई कदम नहीं उठाया। आमदनी डेढ़ गुना करने के बजाय किसानों पर राजस्व वसूली का भार बढ़ाकर उनकी कमर तोड़ने की ही नीतियां बनायी गयी हैं।

रालोद के अमरोहा जिलाध्यक्ष शूरवीर सिंह का कहना है कि किसानों की समझ में आ गया है कि भाजपा किसानों को आपस में लड़ाकर उनकी मूलभूत समस्याओं से भटकाने का काम करती आ रही है। जिसे किसान अच्छी तरह समझ गये हैं और उसके खिलाफ एकजुट हैं। उनकी राष्ट्रीयता भारत है और धर्म किसान है।

उधर भाजपा के दो बड़े जाट नेता संजीव बालियान तथा सत्यपाल सिंह पूरे जोर-शोर से जाट समुदाय को रालोद उम्मीदवार के खिलाफ भाजपा के समर्थन की कोशिश में लगे हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मतदान से एक दिन पूर्व 27 मई की रैली में की जाने वाली ताबड़तोड़ मोहक घोषणाओं की काट के लिए विपक्ष  पहले ही प्रचार में जुट गया था। विपक्ष का कहना है कि मतदान पूर्व की गयी कोई भी घोषणा आदर्श चुनावी आचार संहिता का खुला उल्लंघन है।

कुल मिलाकर कैराना संसदीय तथा नूरपुर विधानसभा सीटों का उपचुनाव बेहद दिलचस्प मोड़ पर है जहां जय-पराजय के लिए दोनों पक्ष पूरी ताकत झोंक चुके हैं। यह मतगणना में ही पता चलेगा कि इस महाभारत का अर्जुन कौन होगा? यदि दोनों में से एक भी सीट भाजपा खो देती है तो उसके लिए आगामी लोकसभा चुनाव जीतना मुमकिन नहीं होगा। वैसे कैराना सीट पर रालोद की मजबूती मानी जा रही है जबकि नूरपुर में तस्वीर धुंधली है।

-टाइम्स न्यूज़ कैराना.