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शिक्षा के नाम पर बड़ा छलावा बने प्राथमिक विद्यालय

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सरकारी विद्यालयों में बच्चों का अभाव है और वहां शिक्षकों पर खूब धन खर्च हो रहा है.

राज्य सरकार द्वारा संचालित प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक स्कूलों पर शिक्षा के नाम पर भारी भरकम बजट खर्च किया जा रहा है। शिक्षा के साथ मुफ्त भोजन, वर्दी तथा पुस्तकें तक उपलब्ध कराई जा रही हैं। शिक्षकों और नीचे से ऊपर तक अफसरों की भारी-भरकम फौज यहां तैनात है। जिन्हें मोटा वेतन और दूसरी कई सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। इस सब के बावजूद इन स्कूलों में ना तो कोई बच्चे भेजना चाहता है और ना ही व्यवस्था में सुधार की किसी को जरूरत है। शिक्षकों और अफसरों के चरागाह बने इन स्कूलों में इनके अध्यापक और सरकारी कर्मचारी तक अपने बच्चे भेजने को तैयार नहीं। इन अध्यापकों के बच्चे कान्वेंट स्कूलों में पढ़ रहे हैं। यदि इन स्कूलों में शिक्षा का स्तर बेहतर होता तो महंगी फीस और दूसरे खर्चों का भुगतान कर यह अध्यापक अपने बच्चे कान्वेंट और निजी स्कूलों में नहीं भेजते।

जिला स्तर पर बीएसए और ब्लॉक स्तर पर बीईओ नया शिक्षा सत्र होते ही इन स्कूलों के अध्यापक अध्यापिकाओं की मीटिंग लेते हैं। उन्हें स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाने को दबाव बनाते हैं। रेलियाँ निकालने जैसे औपचारिक नुस्खे बताए जाते हैं। इसके बाद बच्चे इकट्ठे कर उन्हें पढ़ाने के बजाए गांव, शहर और कस्बों की गलियों में नारे लगवाते हुए घुमाया जाता है। उनकी फोटो खिंचवाकर अखबारों में समाचार छपवाए जाते हैं। यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि शिक्षा विभाग के अफसर और अध्यापक शिक्षा के प्रसार में बहुत योगदान दे रहे हैं। उधर कई बच्चों के माता-पिता अपने बच्चों को यह कहकर निजी स्कूलों में भेजना शुरू कर देते हैं कि सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के बजाए सड़कों और गली-मोहल्लों में घुमाया जाता है।

कई स्कूलों में एक-दो बच्चों पर ही कई-कई अध्यापक हैं तथा कई स्कूलों में बच्चे हैं, अध्यापकों का टोटा है। स्थानांतरण से लेकर नई अध्यापकों को वेतन तक लेने में जिला स्तरीय कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं। उनसे कमीशन तक लेने की खबरें हैं।

सभी सरकारें अपने-अपने कार्यकाल में शिक्षा खासकर प्राथमिक शिक्षा पर भारी भरकम राशि खर्च करने का दावा करती हैं। यह दावे सौ फीसद सही भी होते हैं लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता और धन के सदुपयोग की ओर कोई ध्यान नहीं देता। राज्य में सपा, बसपा की सरकारों में भी यही था और भगवा वस्त्रधारी सत्ताभोगी, योगी के शासनकाल में भी वही सिलसिला जारी है।

मध्याहन भोजन बनाने वाली महिलाओं को अध्यापक अपने बच्चे इन्हीं स्कूलों में भेजने की शर्त लगा देते हैं जबकि वे स्वयं इसके विपरीत अपने बच्चे निजी स्कूलों में भेजते हैं। यदि खाना बनाने वाली महिला उनका कहना मानने में आनाकानी करती है तो उसे घर जाने को कह दिया जाता है।

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आमतौर पर मध्यम श्रेणी के निजी स्कूलों में जहां ढाई-तीन सौ बच्चे पढ़ते हैं वहां तीन से चार हजार का वेतन अध्यापकों को मिलता है। ऐसे स्कूल में लगभग दस अध्यापक होते हैं जिन्हें सभी को मिलाकर चालीस हजार रुपये से अधिक वेतन नहीं मिलता। जबकि सरकारी प्राथमिक स्कूल के एक अध्यापक को ही इतना वेतन मिलता है। ऐसे अध्यापकों पर कहीं-कहीं एक अध्यापक पर एक या दो बच्चों का शिक्षा भार होता है। यानी सरकार एक या दो बच्चों को पढ़ाने पर चालीस हजार का वेतन खर्च करती है जबकि कई अन्य खर्च भी इतने ही पड़ते हैं।

निजी स्कूल में ढाई सौ से 300 बच्चों पर संचालक इतना ही वेतन देता है और शिक्षा का स्तर तथा अभिभावकों को संतुष्ट भी करता है। अधिकारी पर अधिकारी और उनका खर्च जोड़ा जाए तो यहां बिना किसी उपलब्धि पर देश में खुली लूट है। इस धन को निजी स्कूलों में पढ़ रहे छात्रों की सहायता राशि के रूप पर खर्च किया जाए तो अधिक बेहतर होगा।

-जी.एस. चाहल.