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फिर नावों के सहारे नदी पार करेंगे खादर के दर्जनों गांवों के लोग

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डबल इंजन की सरकार भी नहीं बनवा पायी एक अदद पुल.
चकनवाला के पास बाहा नदी के पार बसे एक दर्जन तथा इस पार बसे उनसे भी अधिक गांवों के लिए जीवन दायिनी बरसात फिर बड़ी मुसीबत बनकर आ रही है। दशकों से बाहे पर एक अदद पुल की मांग इस बार भी पूरी नहीं होने से जल से लबालब नदी को पार करने के लिए फिर से नावों के सहारे एक बड़ी आबादी को जीवन जीने को मजबूर होना पड़ेगा। अस्थायी पेंटून पुल अब जवाब दे चुका। उससे खाली बुग्गी के सहारे आरपार जाना भी खतरे से खाली नहीं। वैसे भी बरसात होते ही यह पुल तोड़ दिया जाता है। नदी में पानी बढ़ते ही कैप्सूल एक तरफ हटा दिया जायेंगे। तब नावें ही आरपार के लिए एकमात्र सहारा होंगी।

देश को आजाद हुए सात दशक हो गये। विकास खंड धनौरा और गजरौला के खादर क्षेत्र में आज भी एक बड़ी आबादी मूलभूत सुविधाओं को तरस रही हैं। उन्हीं में से धनौरा ब्लॉक के चकनवाला से सटी बाहा नदी के पश्चिम में उस पार एक दर्जन गांव ऐसे हैं जहां टूटी-फूटी सड़के विभिन्न योजनाओं में जरुर बनीं लेकिन इन गांवों के लोगों की मूल समस्या नदी पार के लिए पुल का अभाव आज भी जस का तस है। सभी दलों के नेताओं ने वायदे बहुत किये लेकिन पुल कोई नहीं बनवा सका। जिसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकतायें भी उन्हें नहीं मिल पा रहीं।

बरसात में इन गांवों का संपर्क शेष क्षेत्र से पूरी तरह कट जाता है। पश्चिम में गंगा नदी तथा पूरब में बाहा नदी के बीच फंसी लगभग पन्द्रह हजार की आबादी को स्वास्थ्य सेवायें तक दूभर हो जाती हैं। लोगों और पशुओं को नीम हकीमों के भरोसे जीवन-मौत के बीच जूझने को मजबूर होना पड़ता है। गर्भवती या प्रसूता महिलाओं के सामने बड़ी कठिन चुनौती होती है, जिसकी कल्पना से ही मन सिहर उठता है।

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1990 में आयी भीषण बाढ़ में यहां भारी पशुधन की हानि हुई और कई लोग जान बचाने को वृक्षों तक पर चढ़ने को मजबूर हुए थे। भारी संख्या में मकान धराशायी हुए। अनाज और घरेलू सामान दबकर या बहकर बरबाद हो गया था। इससे भी शासन या प्रशासन ने कोई सीख नहीं ली और न ही लोगों के दुख-दर्द का उनपर कोई असर पड़ा। इतना जरुर हुआ कि सपा के प्रभावशाली नेता रमाशंकर कौशिक के प्रयास से त्वरित कार्रवाई में एक अस्थायी पुल जरुर बन गया। बरसात के समय उसके बहने के खतरे के मद्देनजर उसे पांच माह के लिए अस्थायी रुप से हटा लिया जाता है। कौशिक ने पक्के पुल के शीघ्र निर्माण का भरोसा दिलाया था लेकिन वह नहीं बन सका।

हर कोई जानता है कि धनौरा से लेकर अमरोहा तक नेताओं की कमी नहीं बल्कि एक से एक ताकतवर नेता है, जिसे जनमत के बल पर यह ताकत हासिल हुई परंतु खादर के इन लोगों की समस्याओं को चुनाव के दौरान याद रखने वाले नेता बाद में पूरी तरह भूल जाते हैं।

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मौजूदा सांसद कंवर सिंह तंवर को सांसद बने पांचवां साल चल रहा है। चकनवाला उनका गोद लिया गांव है। इस गांव के लोगों की काफी कृषि भूमि बाहे पार है। जहां पुल के अभाव में आना-जाना आसान नहीं। तंवर ने वायदा भी किया था कि वे चुनाव जीते तो, सरकार को छोड़िए अपनी जेब से पुल बनवाएंगे। सांसद के वादे और दावे धरे रह गये, पुल बनने की बात तो दूर उन्होंने उधर जाना ही छोड़ दिया।

डेढ़ साल पहले यूपी में भाजपा सरकार बन गयी और केन्द्र में उसका कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। दोनों जगह सत्ता होने के बावजूद यदि तंवर यह काम नहीं करा सकते तो उन्हें आगे के लिए यहां से प्रतिनिधित्व के लिए स्वप्न में भी नहीं सोचना चाहिए।

वे चाहें तो रातोंरात पुल निर्माण के आदेश करा सकते हैं? पांच साल तो बहुत होते हैं।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.