Header Ads

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जय-पराजय जाटों के हाथ, कैराना और नूरपुर उपचुनाव का संदेश

election-jayant-ajit-tabassum-kairana
जाटों के पास पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ''किंग मेकर'' की शक्ति है.

विधानसभा चुनावों में सपा और बसपा ने रालोद को महत्वहीन मानकर जो गलती की थी, उसका एहसास दोनों दलों के नेताओं को अब हो गया होगा। कैराना और नूरपुर में हुई हार के बाद भाजपा को भी पता लग गया होगा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय जिधर जाता है फतह उसी की होती है। कांग्रेस जाटों की ताकत को जानती है लेकिन विधानसभा चुनाव में उसने सपा और बसपा की खामोशी के कारण रालोद से समझौते को कदम पीछे खींच लिए। ऐसे में जाट समुदाय के मतदाता इन दलों के खिलाफ भाजपा के खेमें में चले गये। कई दूसरे कारण भी इसके पीछे थे।

जाट भाजपा के समर्थन में गये तो वह जीती। जब यह समुदाय उससे नाराज हो, विपक्ष के साथ खड़ा हुआ तो उसने कैराना और नूरपुर में परिणाम उलट कर सिद्ध कर दिया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनके पास किंग मेकर की शक्ति है।

2014 की ओर लौटें तो पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जहां भी जाट मौजूद हैं उन्होंने भाजपा का जमकर साथ दिया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस समुदाय की जितनी उपेक्षा की, उतनी किसी ने नहीं की। मोदी सरकार के शासनकाल में अभी तक मंत्रीमंडल में सभी महत्वपूर्ण पद गैर जाटों के पास हैं। सेना, कृषि और खेलों में सबसे श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली इस राष्ट्रभक्त वीर जाति को हाशिये पर धकेल दिया गया है। आज एक भी राज्य का मुख्यमंत्री जाट समुदाय से नहीं है। जबकि इससे पूर्व हरियाणा में बंसीलाल, देवीलाल तथा भूपेन्द्र हुड्डा मुख्यमंत्री रहे जबकि पंजाब में कांग्रेस सरकार में आज भी जाट मुख्यमंत्री है। दिल्ली में साहिब सिंह वर्मा, राजस्थान में अशोक गहलौत आदि तथा उत्तर प्रदेश में भी चौ. चरण सिंह मुख्यमंत्री रह चुके।

जरुर पढ़ें : वादाखिलाफी से नाराज़ किसान मजदूरों का भाजपा को कड़ा संदेश

यही नहीं देश के बहुत गरिमामय पद पर कांग्रेस के शासनकाल में डॉ. गुरदयाल सिंह ढिल्लो सबसे अधिक समय तक लोकसभा स्पीकर रहे। इसके अलावा ज्ञानी हुकम सिंह तथा बलराम जाखड़ जैसे जाट नेताओं को इस महत्वपूर्ण पद पर बैठाया गया। यह भी एक रिकार्ड रहा कि इन नेताओं के नेतृत्व में संसदीय अनुशासन और गरिमा अपने आज तक के कार्यकाल में सर्वश्रेष्ठ रही।

मैं चार वर्षों से बार-बार भाजपा नेतृत्व को आगाह करता आ रहा हूं कि वह जाट समुदाय की  सेवाओं को दरकिनार कर उनके साथ भेदभाव बरतेगी तो यह भाजपा के हित में नहीं होगा। आज पंजाब से लेकर उत्तर प्रदेश तक संपूर्ण जाट समुदाय भाजपा के खिलाफ मुखर है जिसका खामियाजा पंजाब विधानसभा चुनाव और अब कैराना और नूरपुर में भाजपा भुगत चुकी। राजस्थान और मध्य प्रदेश के आसन्न चुनावों में इस समुदाय के साथ गूजर, यादव आदि किसान बिरादरियां भी भाजपा को मजा चखाने को तैयार हैं।

हालात की गंभीरता को समझ भाजपा के सबसे बड़े नेता अमित शाह ने जाट समुदाय को मनाने की कोशिश भी शुरु कर दी हैं। वे 2019 के चुनाव अभियान में सबसे पहले पूर्व सेना प्रमुख दलबीर सिंह सुहाग और क्रिकेट सुपरस्टार कपिल देव के घर हाजिरी देने पहुंचे। वे कुछ भी कहें लेकिन वे इससे जाट समुदाय में यह संदेश देना चाहते हैं कि वे इस समुदाय का सम्मान करते हैं।

कैराना में केवल जाट ही नहीं बल्कि भाजपा उम्मीदवार की बिरादरी के मतदाताओं ने भी भाजपा के खिलाफ मतदान किया। यानि किसान समुदाय ने एकजुट होकर रालोद का साथ दिया। किसान समुदाय में हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही सम्प्रदायों के लोगों ने आपसी सद्भाव की मिसाल कायम की तथा देशवासियों को यह संदेश भी देने की  कोशिश की कि वे दंगा भड़काने की कोशिश करने वाले नेताओं की दाल अब नहीं गलने देंगे। कुछ समय पूर्व दंगों की आग में झुलसे इलाके में रालोद नेता चौ. अजीत सिंह तथा जयंत चौधरी की कोशिश से आपसी सद्भाव का जो माहौल बना है, उसके लिए वास्तव में वे साधुवाद के अधिकारी हैं। बशर्ते यह माहौल भविष्य में भी कायम रहे।

-जी.एस. चाहल.