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मुजफ्फरपुर और देवरिया की घटनाओं से क्यों नहीं दहलते हमारे दिल?

rape-women-abuse
लोग ऐसे दरिन्दों को सबक दिलाने के लिए आज क्यों नहीं आगे आ रहे? हम सब क्यों खामोश हैं?.
बिहार के मुजफ्फरपुर के बालिका गृह की बच्चियों के साथ वहशी दरिन्दगी की चर्चाओं के बीच उत्तर प्रदेश के देवरिया से भी उसी तरह की घटना का पता चला है। इन दोनों घटनाओं की दर्दनाक और समाज में समाजसेवा के मुखौटे लगाए वहशी दरिन्दों का उद्देश्य एक ही दिखता है। इन दो बालिका गृहों की हकीकत सामने आने से शासन और प्रशासन में यदि थोड़ी भी संवेदना है तो देश के तमाम बालिका गृहों और नारी निकेतनों की त्वरित छानबीन करनी चाहिए। देश में तमाम स्थानों पर नेताओं, पुलिस, प्रशासन तथा एनजीओ की मिलीभगत से उस तरह के घिनौने काण्डों को अंजाम दिया जा रहा होगा। मुजफ्फरपुर में तो इस तरह की काली करतूत का मुखिया एक मामूली पत्रकार था, जो प्रति वर्ष सरकार से तीस लाख रुपयों का विज्ञापन हासिल कर रहा था। जबकि उस अखबार की प्रतियां ढाई-तीन सौ के आसपास थीं। ऐसे में तमाम मीडिया कर्मियों और अखबारों की भी जांच की जानी होगी। खासकर सरकारी विज्ञापन छापने वाले कम सकुर्लेशन वाले अखबारों की।

संभल में एक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में करीब दो वर्ष पूर्व भी इसी तरह की वहशियाना करतूतों का खुलासा हुआ था। वहां की कई बेटियों को स्कूल की वार्डन रात में कई अज्ञात लोगों के साथ,  जिनमें कुछ सफेदपोश और कई बड़े अधिकारी हेाते थे, भेजती थी। बच्चियों के साथ रात में जो वहशीपन होता था, उसके बारे में उन्होंने स्वयं बताया था। इन गरीब बेटियों के माता-पिता और अभिभावकों को जब इस बर्बरता का पता चला तो वे स्कूल पहुंचे थे, मीडिया में यह खबर चलने पर कई अधिकारी हरकत में भी आए लेकिन यह कहकर कि मामले की जांच बैठा दी गयी है और दोषियों का पता लगाकर उन्हें कानून के हवाले कर बच्चियों को न्याय दिलाया जायेगा, तत्कालीन सपा सरकार के जाने के बाद प्रदेश में डेढ़ साल से भाजपा की सरकार आ गयी लेकिन कोई पता नहीं यह मामला कब का शांत हो गया।

गरीब बच्चियों को मुफ्त शिक्षा देने के बहाने समाज में बड़े और भले  लोगों के मुखौटों के पीछे छुपे बैठे नृशंस, आदमखोर वहशी दरिन्दे, इनको अपना शिकार बनाने में लगे हैं। खूनी जंगली जानवरों से भी बदतर इन दरिन्दों के लिए सुलभ शिकारगाह बन गए हैं।

देवरिया में मां विंध्यवासिनी बालिका गृह से किसी तरह भागी एक नाबालिग भुक्तभोगी ने जो घटना बतायी उससे सनसनी फैल गयी और बच्चियों के साथ यहां जारी दरिन्दगी से लोगों में रोष तो है लेकिन बेकसूर, बेसहारा और अनाथ लड़कियों की शरणस्थल कही जाने वाली संस्था द्वारा उनपर किए जा रहे अत्याचारों से हमारा समाज आंदोलित नहीं हुआ। इस संस्था की मान्यता डेढ़ साल से रद्द है फिर भी नारी निकेतन भेजी जाने वाली कई महिलाओं को पुलिस ने इस अवधि में यहां भेजा। इससे पुलिस सीधे-सीधे इससे जुड़ी हुई दिखती है।

दिल्ली के निर्भया काण्ड की खबर पर पूरा मीडिया और तमाम जन संगठन और आम आदमी बिना किसी नेतृत्व के इस वहशियाना काण्ड के खिलाफ सड़कों पर उतर पड़ा था। पहले मुजफ्फरपुर, आज देवरिया, इन दोनों से पूर्व संभल कई दर्जन गरीब और बेसहारा बच्चियों के साथ जो हुआ ऐसा ही कहीं और भी हो रहा होगा? यह सब आज जन मानस को क्यों आंदोलित नहीं कर रहा? लोग ऐसे दरिन्दों को सबक दिलाने के लिए आज क्यों नहीं आगे आ रहे? हम सब क्यों खामोश हैं? चुनावी बहसें खबरिया चैनलों पर इन बेसहाराओं की चीखों को क्यों दबाकर बैठ गयीं? क्या हम इन वहशी घटनाओं को बर्दाश्त करने के आदी होने शुरु हो गए? यदि ऐसा है तो हम भी दरिन्दगी का एक हिस्सा हैं। हमें धिक्कार है!

-जी.एस. चाहल.