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सपा-बसपा गठबंधन से चिंतित भाजपा दलितों और किसानों को साधने में जुटी

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किसानों की फसलों के उचित दाम दिलाने के ढोल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 5 वर्षों से पीट रहे हैं.
भाजपा आगामी लोकसभा चुनावों में फिर से विजय की कोशिश में है। लेकिन हाल के देशभर में हुए लोकसभा उपचुनावों में भाजपा की हार ने नेतृत्व को चिंता में डाल दिया है। लोकसभा की सबसे अधिक यानि 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश के चार सीटों पर हुए उपचुनाव ने भाजपा नेतृत्व को हिलाकर रख दिया। इनमें नूरपुर की विधानसभा सीट थी। इन सभी सीटों पर भाजपा के दिग्गजों का कब्जा था। भाजपा के बड़े नेता अच्छी तरह समझ गये हैं कि दो पश्चिम और दो पूरब की सीटों में से चारों का हाथ से निकलना इस बात का संकेत है कि उनसे सभी वर्गों के इतने लोग नाराज़ हैं जो उन्हें उत्तर प्रदेश में पराजित करने को काफी हैं। इससे भाजपा नेतृत्व ने सबसे अधिक ध्यान उत्तर प्रदेश पर केन्द्रित कर दिया है।

इसीलिए 2019 की रणनीति को धार देने के लिए प्रदेश कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक मेरठ में आयोजित की गयी जिसके समापन भाषण में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने प्रदेश में 73+ सीटें जीतने के साथ केन्द्र में 350+ के साथ भारी बहुमत से भाजपा की सरकार बनाने का नारा दिया।  नेताओं ने स्पष्ट किया कि हिन्दुत्व के साथ ही दलित और पिछड़ा वर्ग को लामबन्द करना जरुरी है।

बैठक में जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में दलित आरक्षण का मुद्दा उठाकर दलितों को साधने की कोशिश की वही उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के सहारे ओबीसी को भाजपा के पाले में बनाए रखने का प्रयास किया गया। पार्टी नेता जानते हैं कि 2017 के विधानसभा चुनाव में उसे प्रचंड बहुमत प्रदान करने में दलितों और पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की अहम भूमिका थी।

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उधर लोकसभा चुनावों के बाद विधानसभा चुनावों में 2017 में भाजपा की पराजय के सपने देखने वाली सपा और बसपा को जब अपनी करारी हार का झटका लगा तो उनकी आंखें खुलीं। इस पराजय ने अखिलेश यादव और मायावती को धुर विरोधी होने के बावजूद एक मंच पर ला खड़ा किया। जिसके बल पर वे मुख्यमंत्री योगी और उपमुख्यमंत्री मौर्य के गढ़ गोरखपुर और फूलपुर को भाजपा से छीनने में सफल रहे। यही नहीं कैराना और नूरपुर में मुजफ्फरनगर दंगों में हुए साम्प्रदायिक धु्रवीकरण को धता बताते हुए हिन्दू मतदाताओं ने भी भाजपा के खिलाफ मतदान कर दोनों सीटों पर भाजपा को  पराजित कर दिया। दोनों स्थानों पर मृत भाजपा नेताओं के परिजनों को उम्मीदवार बनाने के बावजूद सहानुभूति लहर भी भाजपा के पक्ष में काम नहीं आयी।

इन परिणामों में किसानों की नाराजगी और युवकों में बेरोजगारी को लेकर रोष जहां बड़ी वजह रहा, वहीं दलित, मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग का गठजोड़ भी बड़ा कारण था। इन सारी वजहों से भाजपा नेतृत्व भली-भांति परिचित है। यही कारण रहा कि अमित शाह दलितों, पिछड़ों और नवयुवकों को साधने के गुर बताते देखे गए। उन्हें स्पष्ट दिख रहा है कि जाट जहां फिर से रालोद की ओर मुखातिब हो रहे हैं, दलित बसपा से जुड़ गए हैं और गुर्जर, नाई, तैली, सैनी, यादव प्रजापति भी भाजपा से उदास हैं। भाजपा इन समुदायों को साधने के उपायों पर मंथन करने को बाध्य है। बड़ा सवाल है कि इनको साधने में भाजपा कैसे सफल होगी? सपा, बसपा, रालोद गठबंधन की गांठ तोड़े बिना यह संभव नहीं। क्या वह इस में सफल हो सकेगी?

जाट, यादव, गुर्जर और सैनी चार बड़े कृषक समुदाय हैं। किसानों की फसलों के उचित दाम दिलाने के ढोल भाजपा खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पांच वर्षों से पीट रहे हैं। किसानों की आमदनी दोगुनी करने के खोखले दावे सुनते-सुनते इन समुदायों के कान पक गए। उत्पादों के उचित दाम दिलवाने के विपरीत सरकार ने बिजली बिल एक झटके में दोगुने कर किसानों का दम निकाल कर रख दिया। पेस्टीसाइड तथा उर्वरकों के दाम बढ़ाए। कृषि यंत्रों और उनके पुर्जों पर अनाप-शनाप जीएसटी थोपकर तथा डीजल के दाम बेतहाशा बढ़ाकर किसानों की आर्थिक रीढ़ तोड़ दी। भला ये लोग यह भी नहीं समझ रहे कि सरकार उनके साथ कितना छल कर रही है। समस्याओं को लेकर किसानों के प्रदर्शन जारी हैं। करोड़ों किसानों और बेरोजगारों की आवाज सुनने के बजाय प्रधानमंत्री अपने मन की सुनाये जा रहे हैं।

भाजपा के बड़े नेता यहां की जमीनी हकीकत से वाकिफ तो हैं लेकिन पीएम और उनके साथी अपनी वाहवाही के सिवाय कुछ सुनना नहीं चाहते। विपक्षी एकता जहां भाजपा के लिए बड़ा खतरा है, वहीं हिन्दुत्व का नारा भी पहले जैसा धारदार नहीं रहा। क्योंकि मंदिर निर्माण और कश्मीर से धारा-370 हटाने में भाजपा प्रचंड बहुमत के बाद भी विफल रही। राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में आसन्न चुनावों में हार की खबरों से भाजपा और बेचैन है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पराजय की आशंका से उसके नेता संसदीय और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की कोशिश में जुट गए हैं। इन तीन राज्यों में हार की काली छाया संसदीय चुनावों पर पड़नी अनिवार्य है।

~जी.एस. चाहल.