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कुर्सी युद्ध में जनता के दर्द से बेखबर नेता

modi rahul maya akhilesh
झोटों की लड़ाई में जो हाल झुंडों का होता है, वही हाल इन नेताओं ने जनता का कर दिया है.
देश के सभी राजनैतिक दल विभिन्न समस्याओं से जूझ रही देश की जनता को भूल 2019 के संसदीय चुनावों के मकड़जाल में उलझ गए हैं। देश के नेताओं में कुर्सी-भूख इतनी बढ़ गयी है कि कुर्सी पर बैठे नेता उसे छोड़ना नहीं चाहते और कुर्सी गंवाए बैठे नेता उसे फिर से हथियाना चाहते हैं। सत्ताधारी तथा सत्ताविहीन दोनों ही नेताओं की नींद हराम हो गयी है। ये लोग जनता के दुख-दर्द को भूल सारी ऊर्जा कुर्सी बचाने और कुर्सी हथियाने में खर्च कर रहे हैं।

सीटों के लिहाज से सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में यह खींचतान और उठापटक कुछ ज्यादा ही तेज होती जा रही है। साम्प्रदायिक और जातीय संतुलन बनने-बिगड़ने के पारखी कुछ ज्यादा ही माथापच्ची में लगे हैं। जबकि सूबे का किसान डीजल और बिजली बिलों में वृद्धि को लेकर परेशान हैं, वहीं बेरोजगार नवयुवक भविष्य को लेकर चिंताओं और विषाद से ग्रस्त हैं। आम आदमी की आय रोजगार कम होने से घट गयी और उसपर करों का बोझ लादकर सरकार सरकारी खजाना भरकर वाहवाही लूटने का दंभ भर रही है।

डीजल और भारी भरकम टैक्स लगाकर पैट्रोलियम मंत्री उसे गरीबों को राहत भरा कदम कह कर जले पर नमक छिड़कने से बाज नहीं आ रहे। प्रधानमंत्री लोगों को स्वच्छता का नारा देकर मूल समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश में एक बार फिर जुट गए हैं। राहुल मन्दिरों की ओर और मोदी मस्जिदों में सिजदा करने पहुंच रहे हैं।
modi in masjid

प्रदेश में बीते उपचुनावों में भाजपा को परास्त करने वाले महागठबंधन के नेताओं में इस विषय पर अब खामोशी है। गठबंधन की सफलता को लेकर यह 'खामोशी’ सवाल खड़ा करती है। उधर बहन मायावती द्वारा कांग्रेस और भाजपा पर समान हमला भी गठबंधन की गांठ को ढीली करने का संकेत है।

उधर समाजवादी पार्टी में बिखराव की नींव पड़ गयी है। सपा के युवा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने परिवार के दोनों बड़े बूढ़ों को दरकिनार कर दिया। चाचा शिवपाल यादव ने अलग मोरचा बना लिया है। दूसरे दलों से गठबंधन करने वाले इस दल के अंदर ही 'लठबंधन’ चल पड़ा है। ऐसे में जहां अखिलेश यादव को अपना कुनबा समेटने में ऊर्जा खपानी पड़ रही है वहीं भीम सेना के सेनापति चन्द्रशेखर उर्फ रावण ने रिहा होते ही भाजपा के खिलाफ तीखी बयानबाजी कर मायावती को बुआ सम्बोधित कर बसपा के लिए काम करने के संकेत दे दिए हैं। दलित मतों में सेंधमारी की फिराक में बैठी भाजपा और कांग्रेस के लिए यह चिंता का सबब बन गया है। रावण का यह बयान और भी महत्वपूर्ण है कि वे बहुजन समाज को एकजुट करने के लिए सभी राज्यों का भ्रमण करेंगे।

राजनीति के पंडितों का मानना है कि भाजपा के लोहे से लोहा काटने की तर्ज पर चन्द्रशेखर रावण को जेल से रिहा कराया है। वे दलित मतों में विभाजन कराने की योजना पर काम कर रहे हैं। अभी तक भाजपा रावण और मायावती को एक-दूसरे का प्रतिद्वंदी मान रही थी लेकिन पन्द्रह माह तक जेल में बंद रहने और मायावती की खामोशी ने चन्द्रशेखर को मायावती के साथ आने पर मजबूर कर दिया है। ऐसे में रावण की रिहाई भाजपा के लिए लाभ की जगह नुक्सान का सौदा रहा। यही नहीं, रावण ने एक मुस्लिम नेता को अपना भाई कहकर दलित-मुस्लिम कार्ड खेलने की चाल भी चली।

इस दलित-मुस्लिम नारे से सपा नेतृत्व की नींद उड़ा दी है। यही कारण है कुछ दिन पूर्व जो अखिलेश सपा-बसपा गठबंधन का राग जोर-शोर से अलापा रहे थे वे इस बारे में बिल्कुल खामोश हैं। कांग्रेस जहां अखिल भारतीय स्तर पर दलित-मुस्लिम मतों पर कब्जा करने में लगी है, वहीं मायावती भी इन दोनों वर्गों को अपने पक्ष में मानकर सत्ता समीकरण साधने की कोशिश में है। ऐसे में बसपा के लिए कांग्रेस से हाथ मिलाना आसान नहीं। वे भाजपा और कांग्रेस दोनों को एक तराजू से तोल रही हैं। उधर सपा ऐसे में अकेला पड़ने के कगार पर पहुंची तो उसका हाल पिछले संसदीय चुनाव जैसा होगा।

उधर चौधरी अजीत सिंह अभी भी यूपी में सपा-बसपा और रालोद गठबंधन पर भरोसा कर प्रचार में लगे हैं। वे कांग्रेस के सम्पर्क में भी हैं। राजनीतिक समीकरणों के बनने बिगड़ने में देर नहीं लगती लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि नेताओं की कुर्सी-दौड़ में देश की बेकसूर जनता का जो बुरा हाल हो रहा है उसका निराकरण कौन करेगा? झोटों की लड़ाई में जो हाल झुंडों का होता है, वही हाल इन नेताओं ने जनता का कर दिया है।

-जी.एस. चाहल.