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किसानों की व्यथा कथा : दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की

सरकार ढोल पीट रही है कि किसानों की आमदनी बढ़ायी गयी है.
'दर्द बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की'- यह उक्ति कृषि प्रधान देश के किसानों पर सटीक बैठती है। साढ़े चार साल में केंद्र में बैठी मोदी सरकार किसानों की आय बढ़ाने बल्कि दोगुना करने के दावे बार-बार कर चुकी लेकिन सरकार ने एक भी ऐसा कदम नहीं उठाया जिससे किसानों की आय बढ़ सके बल्कि बार बार उसके साथ छल किया गया है। आज किसान अपने साथ किए गए सरकारी छल को समझ गया है तथा बदले के लिए मतदान की प्रतीक्षा कर रहा है।

कई किसान संगठन अपनी कई मांगों को आगे रखते हुए किसान हितों के बजाय राजनीति कर रहे हैं। इससे किसानों की मूल समस्याओं को हल करने के बजाय उन्हें उलझाने का ही काम होता है। दरअसल किसानों की दो ही मूल समस्याएं हैं, एक किसानों को उनकी फसलों का उचित लाभकारी मूल्य मिले और दूसरा गन्ना आदि का भुगतान हफ्ता भर में अनिवार्य रूप से किया जाए।

उचित लाभकारी मूल्य का सीधा तात्पर्य लागत और श्रम को जोड़ कर इतना मुनाफा दिया जाए कि किसान का जीवन यापन सही ढंग से चल सके। टमाटर, आलू, गोभी, प्याज आदि महत्वपूर्ण सब्जियों का मूल्य कभी-कभी इतना कम हो जाता है कि किसानों को मंडी तक ले जाने तक का भी खर्च नहीं मिलता। ऐसे में उसे भारी लागत और महीनों की मेहनत से उत्पन्न फसलें खेत में ही जोतनी पड़ती हैं अथवा सड़कों पर फेंकनी पड़ती हैं। कम उत्पादन पर यह हालत हो जाती है कि प्याज और टमाटर जैसी सब्जियां यहां सौ रुपए तक पहुंच जाती है। अधिक उत्पादन पर किसान को सौ रुपए भी नहीं दिया जाता और कम होने पर सौ रुपए दिए जाते हैं। यदि सरकार मूल्य सीमा थोड़ी ऊँच-नीच पर करने की नीति बनाए तो किसान और उपभोक्ता दोनों ही लाभ में रहेंगे। गेहूं, मक्का, जौ, बाजरा, चावल और चना, उड़द आदि दालों के भाव भी संतुलित रहें यानी लागत और श्रम के बाद उचित लाभकारी मूल्य मिले तो उचित होगा।

गन्ना एक ऐसा कृषि उत्पाद है जो सबसे अधिक रोजगार प्रदान करता है। इससे केवल किसान ही नहीं बल्कि किसानों से अधिक दूसरे लोगों को यह रोजगार प्रदान करता है। गन्ना बोने से मिल तक पहुंचने में भारी श्रम लगाना पड़ता है जिसमें मजदूरों और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों का काम होता है। इससे ट्रैक्टर तथा दूसरे कृषि यंत्र बनाने वाली कंपनियों में कार्यरत लोगों का रोजगार जुड़ा होता है।

चीनी मिलों में रोजगार के सबसे ज्यादा मौके होते हैं जहां दैनिक मजदूरों से लेकर विभिन्न मकैनिक और अधिकारी तथा कृषि वैज्ञानिक काम करते हैं। यही नहीं चीनी से बनने वाली तमाम मिठाइयां, कई पेय तथा खाद्य पदार्थों में चीनी की जरूरत, वहां भी रोजगार सृजन का कारण होती है।

मिलों से निकले शीरे से अल्कोहल और एथनॉल बनाने बनाने के कारखाने चलते हैं जिससे रोजगार के अवसर मिलते हैं। गजरौला की जुबिलेंट फैक्ट्री में कई हजार लोग प्रत्यक्ष रोजगार पाएं हैं। इस कंपनी के अधिकांश उत्पाद शीरे की देन हैं जिन्हें विश्वभर में बेचा जाता है।

दरअसल गन्ना एक ऐसा कृषि उत्पाद है जो किसानों के अलावा विभिन्न क्षेत्रों में भी सबसे अधिक रोजगार प्रदान करता है। गन्ने की खोई से बिजली उत्पादन और कागज और प्लाई-वुड बनाया जाता है।

इतने महत्वपूर्ण कृषि उत्पाद को केवल किसान तक सीमित मानकर चला जाता है। गन्ने का समय से भुगतान किया जाना चाहिए। किसानों को इस बात पर ज्यादा रोष है कि उनके माल का पैसा वर्षों तक रोक लिया जाता है और उनपर सरकारी बकाया पर लगातार पेनेल्टी डालकर कर्ज से दाब कर भुगतान की जोर जबरदस्ती की जाती है। उचित मूल्य और समय से भुगतान किसानों की दूसरी समस्याओं का भी निराकरण करेंगी। एमएसपी, फसल बीमा जैसी चीज़ें किसानों को बहकाने वाली झोलाछाप दवाएं हैं जो उसका दर्द कम करने के बजाय बढ़ाने का काम ही करती आ रही हैं।

पांच-छह प्रतिशत फसल मूल्य बढ़ाकर किसानों के साथ बड़ा छल है। जब बिजली बिल लगभग दोगुना कर दिए गए, डीजल का मूल्य रोज बढ़ाया जा रहा है, कृषि मशीनरी में प्रयुक्त होने वाली ग्रीस और मोबिल ऑयल जैसे लुब्रीकेंट दोगुने से भी ऊपर कूद गये। कृषि यंत्र और पेस्टीसाइड के दाम और भी ऊपर हैं। ऐसे में पांच-छह प्रतिशत दाम बढ़ाकर किसानों की आय कैसे बढ़ सकती है? इससे तो आय पहले से भी घट गयी।

गन्ना मिलों का पता नहीं कब चलेंगी? पिछला भुगतान हुआ नहीं। इस सत्र के गन्ना मूल्य का भी पता नहीं कि क्या होगा? कोल्हू-क्रेशर दो सौ रुपए को खरीद रहे हैं। यह सारी वजहें किसानों को रसातल में धकेलने वाली हैं। सरकार ढोल पीट रही है कि किसानों की आमदनी बढ़ायी गयी है।

-जी.एस. चाहल.