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नेताओं को फिर याद आया अन्नदाता

rahul modi
चुनाव से पूर्व ऋण-मुक्ति लागू हुई तो ठीक, वरना कुर्सी पर खतरा गहरायेगा.
वैसे तो चुनावी मौसम में सभी दलों को हर बार किसान याद आते हैं लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में किसान कुछ ज्यादा ही मुख्य भूमिका में रहेगा। केन्द्र की भाजपानीत एनडीए सरकार जिसे मोदी सरकार कहना उपयुक्त होगा, ने साढ़े चार साल के शासन में जिस प्रकार किसान हाशिए पर डाल दिया था, उसे संसदीय चुनाव आते ही किसान की कुछ ज्यादा ही फिक्र सताने लगी है। ताजा विधानसभा चुनावों में पांच राज्य भाजपा विहीन होने से उसे तगड़ा झटका लगा है और यह झटका किसानों ने दिया है, यह भाजपा नेतृत्व अच्छी तरह जान गया है। यही कारण है कि अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की नींद खुल गयी है, वे किसानों, बेरोजगारों तथा छोटे कारोबारियों के बारे में सोचने लगे हैं। वैसे चुनाव से पूर्व इन वर्गों को राजी करने में लगभग तीन माह का समय बचा है जिसमें सिवाय आश्वासनों के कुछ ठोस नहीं हो सकता और भाजपा के अब तक के आश्वासनों के हवा-हवाई साबित होने के कारण उनपर जनता भरोसा भी शायद ही करे।

यह कांग्रेस समेत दूसरे दल भी समझ गये हैं कि लोकसभा चुनाव में किसान जिसे चाहेगा सिंहासन सौंपेगा। ऐसे में जिन तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी है, उनमें कांग्रेस ने किसानों के कर्ज माफ करने का आदेश जारी कर दिया। उसने हाल में चुनावों के दौरान दस दिन में कर्ज माफी के वायदे को पूरा कर दिया है। उधर असम में भाजपा सरकार ने भी किसानों के छह सौ करोड़ के कर्ज माफ किए हैं तथा गुजरात की भाजपा सरकार ने किसानों के बिजली बिल खत्म करने का काम किया है।

तेलंगाना में दोबारा सत्ता में आयी वीएसआर राव सरकार ने चुनाव पूर्व ही किसानों को दूसरे राज्यों से अधिक फसल मूल्य तथा प्रति एकड़ सब्सीडी योजना चलाकर राहत प्रदान कर दी थी। यही कारण रहा कि वह दोबारा भारी बहुमत से सत्तारुढ़ हो गयी। छत्तीसगढ़ में रमन सरकार ने किसानों का सबसे अधिक शोषण किया और मीडिया में करोड़ों रुपए प्रदेश की जनता के खर्च कर आत्मप्रशंसा के बावजूद उन्हें मुंह की खानी पड़ी। यहां भाजपा सबसे बुरी तरह हारी।

उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आत्मप्रशंसा में अखबारों में आयेदिन करोड़ों के विज्ञापन दिए जबकि जमीन पर वह नहीं था जो विज्ञापनों में दिखाया गया था। उन्हें पता चल गया होगा कि झूठे प्रचार को लोग समझते हैं। आजकल युवा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी जनता की कमाई के करोड़ों रुपए के बड़े औद्योगिक घरानों के अखबारों और टीवी चैनलों पर विज्ञापन निकलवा रहे हैं। अपना और प्रधानमंत्री का चेहरा देखकर खुश हो रहे होंगे। यही काम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भी बढ़-चढ़कर कर रहे हैं। विज्ञापनों पर जनता के खून-पसीने की जितनी कमाई केन्द्र की मोदी सरकार, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तथा छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान की रमन, शिवराज और सिंधिया की पिछली सरकारों ने बरबाद की है उतनी देश अथवा प्रदेश की किसी सरकार ने नहीं की। जबकि भाजपा के नेता यह भली-भांति देख चुके कि उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार और अखिलेश सरकार इस तरह की धन बरबादी के बाद जनता ने सत्ता से बाहर कर दी थीं।

यदि किसान के कर्ज-मुक्ति का सवाल उठता है तो भाजपा नेतृत्व नए-नए बहाने गढ़ने लगता है। जबकि विज्ञापनों में किया जा रहा खर्च जोड़ा जाए तो किसानों की कर्ज-माफी का धन उससे बहुत कम बैठेगा। किसानों की खस्ता आर्थिक हालत के लिए सरकारी नीतियां दोषी हैं। इसलिए उनका यह भार सरकारी खजाने से पूरा किया जाना चाहिए। सपा नेता अखिलेश यादव को भी ताजा स्थिति से डरकर मांग करनी पड़ी है कि सभी किसानों का सारा कर्ज माफ करना चाहिए। किसानों के मतों के लिए देश के सभी दलों के नेताओं को अब कर्ज-माफी, सीधा रास्ता लगता है। जो सत्ता में बैठे हैं उन्हें किसानों की ऋण-मुक्ति चुनाव पूर्व करनी होगी, यदि वे ऐसा नहीं कर पाये तो आगामी संसदीय चुनाव उनके लिए खतरे की घंटी सिद्ध होंगे। अब आंशिक नहीं बल्कि संपूर्ण कर्ज-मुक्ति की मांग उठ रही है। भाजपा के लिए गंभीर चिंतन और मनन का विषय है। चुनाव से पूर्व ऋण-मुक्ति लागू हुई तो ठीक, वरना कुर्सी पर खतरा गहरायेगा।

~जी.एस. चाहल.