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भाजपा राज में सरकारी सेवाओं के बंद होते दरवाजे

unemployment in india
सरकार ने सरकारी विभागों में कामगारों की संख्या बढ़ाने के बजाय कम कर दी.
बेरोजगारों को रोजगार देने के नारे के साथ 2014 में देश की सत्ता में आयी मोदी सरकार ने सबसे बड़ा छल देश के नौजवानों के साथ किया है। देश का नौजवान सरकारी और निजि संस्थानों में रोजगार का आकांक्षी है। मोदी सरकार का कार्यकाल पूरा होने को है लेकिन इस दौरान बेरोजगारों की लाइन की लम्बाई और बढ़ गयी है। सरकार ने सरकारी विभागों में कामगारों की संख्या बढ़ाने के बजाय कम कर दी और इसमें लगातार कमी की जा रही है। कई सरकारी उपक्रम या तो बेच कर निजि हाथों के हवाले कर दिए गए अथवा कई दूसरे उपक्रमों में विलय के बहाने मार दिए गए। यह क्रम अभी जारी है।

रोजगार उपलब्ध कराने के भ्रमात्मक आंकड़े देकर जनता के साथ छल किया जा रहा है। हाल में ही खबर आयी है कि देश की सबसे बड़ी सरकारी बैंक एसबीआई के चार हजार से अधिक कर्मचारी दिसम्बर के अंत में रिटायर हो रहे हैं यानी इतने पद रिक्त हो जायेंगे। यदि इन सभी पदों के लिए इतने ही युवाओं का चयन कर लिया जाता तो चार हजार बेरोजगारों को रोजगार मिल जाता लेकिन सरकार ने साढ़े चार सौ के करीब नये लोगों की रिक्तियां जारी की हैं। यानी नये पद सृजित करने के बजाय पहले ही रिक्त चल रहे पदों को भी भरने का इरादा सरकार का नहीं है। यह तो एक मामूली उदाहरण है।

घाटे में चल रही सरकारी बैंकों को धीरे-धीरे किसी एक बैंक का विलय कर खत्म किया जा रहा है। नोट बन्दी के समय कई बैंकों का विलय किया गया तथा विजया, देना को अन्य बैंक में समाहित कर तीन बैंकों का एक बैंक बनाकर दो बैंकों का अस्तित्व ही खत्म किया जा रहा है। इससे रोजगार देने का रास्ता बन्द कर क्या सरकार बेरोजगार युवकों का संकट नहीं बढ़ा रही? अभी कई और बैंकों की हड़तालों का काम शुरु हो गया है। एटीएम से नकदी नदारद है। पचास फीसदी एटीएम बन्द करने का फैसला हो चुका है। क्या यह सरकार की आर्थिक बदहाली और सरकारी सेवायें कम करने वाला कदम नहीं है? रेलवे में नौकरियां बंद हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में बीस हजार सरकारी स्कूल बंद कर दिए गये हैं। दूसरे सरकारी महकमों में यही या इससे भी बदतर हालात हैं। भारत को युवाओं का देश कहकर नवयुवकों के मतों से केन्द्र और राज्यों में सत्ता में आयी भाजपा सरकार रोजगार प्रदान करने में बुरी तरह विफल है। यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि झूठ बोलकर ऐसी सरकारों के नेता बहानेबाजी कर फिर से सत्ता में आने की कोशिश में जुटे हैं।

~जी.एस. चाहल.