सपा-बसपा-रालोद गठबंधन यूपी में रोक देगा भाजपा-कांग्रेस का चुनावी रथ.
लोकसभा के चुनावों का मुकाबला मोदी बनाम राहुल होने जा रहा है। दोनों ओर से तैयारियां शुरु हो गयी हैं। देश की सत्ता हासिल करने के लिए दोनों पक्ष किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं। चुनावी महाभारत में क्षेत्रीय दल अपनी शर्तों के साथ राष्ट्रीय दलों से गठबंधन करने की जोड़तोड़ में लग गये हैं। यह तो मतदाता तय करेंगे कि 2019 में किसके सिर सत्ता का ताज सजेगा। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के ताजा नतीजों से पता चलता है कि भाजपा की लोकप्रियता कम हुई है और कांग्रेस का आकर्षण जनता में बढ़ा है।

लोकसभा 2019 के चुनावों के आने वाले सौ दिनों में एनडीए और यूपीए के सहयोगी दलों की भूमिका नतीजों की तस्वीर बहुत कुछ साफ कर देगी। इस बार सत्ता का फैसला उत्तर प्रदेश के दो क्षेत्रीय दलों सपा और बसपा के मिजाज पर भी निर्भर करेगा। यदि उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और रालोद में गठबंधन होता है (भले ही कांग्रेस इस गठबंधन से बाहर रहे) तो यहां पिछले चुनाव यानी 2014 में 73 सीटें हासिल करने वाली भाजपा 10-12 सीटों तक सिमट सकती है। ऐसे में उसे इस सबसे बड़े अकेले राज्य में ही कम से कम 60 सीटों का घाटा उठाना पड़ेगा जिसकी भरपाई उसके लिए किसी भी हालत में दूसरे राज्यों से नहीं हो सकती। क्योंकि महाराष्ट्र में राहुल और शरद पंवार का गठबंधन बहुत मजबूत है तथा भाजपा की साथी शिवसेना खुलकर अकेले चुनावी मैदान में उतरने की घोषणा कर चुकी है। भाजपा और शिवसेना का आपसी टकराव यहां दूसरे सबसे बड़े राज्य में कांग्रेस व पंवार को संजीवनी प्रदान कर भारी बढ़त दिलाने का काम करेगा। सी वोटर के ताजा सर्वे ने यहां 48 में से 30 सीटें यूपीए के खाते में जाने का अनुमान लगाया है।

राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, हरियाणा जैसे राज्यों में जहां 2014 में भाजपा सारी सीटें जीत ले गयी थी, इन सभी राज्यों में विधानसभा चुनावों में उसका ग्राफ बहुत नीचे चला गया है। ऐसे में इन सभी राज्यों में उसका प्रदर्शन काफी नीचे जाना तय है। दक्षिण में भाजपा का कोई वजूद नहीं। जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल वहां मजबूत हैं। बंगाल और तेलंगाना में वह साफ है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस उस पर भारी है। उत्तराखंड, हिमाचल और असम में भाजपा बेहतर दिखती है लेकिन यहां भी कांग्रेस उससे संघर्ष की हालत में है।

पंजाब और तमिलनाडु में कांग्रेस शक्तिशाली है जहां 2014 के मुकाबले वह बहुत बेहतर हालत में है। बिहार में यूपीए और एनडीए में बराबर की टक्कर की स्थिति है।

राज्यवार स्थिति पर बारीकी से गौर करने पर पता चलता है कि उत्तर प्रदेश को छोड़कर एनडीए और यूपीए में कड़ी टक्कर है तथा कोई भी बहुमत तक पहुंचने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में बहुत पाने के लिए एनडीए हो या यूपीए जिसे भी उत्तर प्रदेश से 50 से 60 सीटें मिलेंगी केन्द्र पर उसी की सत्ता होगी।

यह भी कहा जा सकता है कि यदि उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा गठबंधन नहीं बनता तो यहां भाजपा 60 से 70 सीटें प्राप्त कर आसानी से केन्द्र पर कब्जा कर सकती है।

इसके विपरीत सपा-बसपा और रालोद गठबंधन भी यदि अस्तित्व में आता है तो यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों ही धराशायी होंगी तथा गठबंधन साठ सीटों तक हाथ मार सकता है। ऐसी स्थिति में यह गठजोड़ 2019 में किंगमेकर की स्थिति में होगा। मोदी विरोधी यह धड़ा भले ही भाजपा के साथ न जाये लेकिन कांग्रेस के साथ माया और अखिलेश अपनी शर्तों पर ही समझौता करेंगे। यह समय ही बतायेगा कि ऊंट किस करवट बैठेगा लेकिन बुआ-बबुआ के सामने एक साथ आना अपरिहार्य मजबूरी है। चौ. अजीत सिंह ने यह कहा भी है कि गठबंधन छोड़ अकेले चलने वाले क्षेत्रीय दल जिन्दा नहीं बचेंगे।

~जी.एस. चाहल.