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अगले सौ दिन करेंगे मोदी और राहुल की किस्मत का फैसला

modi vs rahul
लोग जानना चाहते हैं कि अगला प्रधानमंत्री कौन?
2019 का आगाज राजनीतिक हलचलों के साथ शुरु हुआ है और नए साल के पहले सौ दिन भाजपा और कांग्रेस में देश की सत्ता के लिए भारी खींचतान के रहेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा उनके साथी जहां फिर से पांच साल को सत्ता बचाये रखने की पैंतरेबाजी में जोर लगायेंगे वहीं राहुल गांधी उन्हें सत्ता से हटाने की पुरजोर कोशिश कर पहली बार प्रधानमंत्री बनने के प्रयास में रहेंगे। इसी के साथ-साथ कई क्षेत्रीय दलों के नेता भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पाने के सपने पाल रहे हैं। वे चाहते हैं कि खंडित जनादेश में उनके हाथ 'अंधे की बटेर' लग जाये। लोग जानना चाहते हैं कि अगला प्रधानमंत्री कौन? 2018 के अंत में पांच राज्यों के चुनावी परिणामों ने जहां भाजपा को निराश किया वहीं कांग्रेस का मनोबल इससे बढ़ा है। साथ ही मीडिया में अगले प्रधानमंत्री के लिए राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी पर चर्चा तेज हो गयी है।

खुले दिमाग से विचार किया जाये तो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल में देश में रोजगार की स्थिति बद से बदतर हुई है। जिन नौजवानों को 2014 में लोकलुभावन सपने दिखाकर नरेन्द्र मोदी ने आकर्षित किया, उनके कार्यकाल में यह वर्ग सबसे अधिक मायूस हुआ है। तमाम सरकारी विभागों में भारी रिक्तियां हैं लेकिन केन्द्र और भाजपा शासित राज्यों में नियुक्तियां नहीं की जा रहीं। किसानों तथा ग्रामांचलों के मजदूरों की घटती आय से उनकी क्रिय शक्ति लगातार कम हो रही है। यही कारण है कि कस्बों और शहरों के कारोबारियों का व्यापार सिकुड़ता जा रहा है। ऐसे में उद्योगों का माल भी कम बिक रहा है। वहां लगातार छंटनी हो रही है और लाखों छोटे उद्योग बंद हो गये।

कहा जा रहा है जीएसटी के बाद भी वांछित यानी लक्ष्य के अनुरुप राजस्व नहीं मिल रहा। कर बिक्री और आय पर लगता है। लोगों की जेब बेरोजगारी की मार से खाली है। उनकी क्रय शक्ति कम हो गयी जब माल ही नहीं बिकेगा तो कर कैसे आयेगा? इसके लिए रोजगार देने की जरुरत है। सरकारी सेवाओं में अवसर होने के बावजूद सरकार नौजवानों को नौकरी नहीं देना चाहती। तो बेरोजगारी घटने के बजाय बढ़ती जा रही है। नये रोजगार स्रजन का चार वर्षों में कोई प्रयास नहीं किया गया। अपनी पीठ स्वयं थपथपाने और प्रचार करने में सरकारी खजाने का एक बड़ा भाग खर्च किया जा रहा है। विफलताओं को विपक्ष के माथे मंढने का जोरदार प्रयास चलता रहा है।

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लोगों ने फिर से उसी कांग्रेस को अपना लिया जहां वह भाजपा को पसंद कर रही थी। हालांकि वहां कांग्रेस के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

रोजगार की तलाश में भटकते नौजवान और किसान तथा मजदूर 2019 में बहुत निराशा के साथ कदम रख रहे हैं। चुनावी प्रचार में फिर से देश के नेता उन्हें हसीन सपने दिखायेंगे। इस बार ये सभी वर्ग बहुत संजीदा हैं। तथा मतदान तक मंथन भी करेंगे। वे काफी ठोक बजाकर फैसला लेंगे। वे आश्वासनों के बजाय चुनावों से पूर्व किए कार्यों के आधार पर चयन करेंगे। सौ दिनों में नेताओं की धड़कनों का जनता जायजा लेती रहेगी।

-टाइम्स न्यूज़ गजरौला.