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किसानों की अनदेखी भाजपा को यूपी में भारी पड़ेगी

narendra modi rahul gandhi
सपा-बसपा का महागठबंधन भाजपा और कांग्रेस दोनों पर हावी.
उत्तर प्रदेश में इस बार लोकसभा चुनाव में सपा, बसपा और रालोद महागठबंधन तथा भाजपा में महामुकाबला होगा। कांग्रेस इस सबसे बड़े राज्य में हाशिए पर जाती दिख रही है। यहां की 80 सीटों में से अधिक से अधिक हथियाने की कोशिश दोनों ओर से होगी। देखा जाये तो भाजपा यहां के अपने पुराने साथी दलों को मनाने में सफल होगी तथा वह भी कई छोटे दलों के साथ प्रतिद्वंदी के खिलाफ मैदान में उतरेगी।

यह तो अब निश्चित है कि अखिलेश, मायावती और अजीत सिंह का गठबंधन मजबूरी है। ऐसे में भाजपा इनमें से किसी के भी खिलाफ जितनी हमलावर होगी इस गठबंधन की गांठ उतनी ही मजबूत होगी। इस कृषि प्रधान राज्य के किसानों से विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह वादा किया था कि वे डबल इंजन की सरकार बनवायें। उनके कर्जे समाप्त किये जायेंगे। लेकिन प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद उन्होंने यह भार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सिर मंढ दिया। किसान जानते हैं कि मनमानी शर्तों के साथ चंद किसानों के एक लाख तक के कर्ज माफ किए जिनमें अधिकांश किसानों के हजार-पांच सौ तक के ही कर्ज माफ किए गये। इससे किसान खुश होने के बजाय नाराज हो गये। उन्होंने अपनी नाराजगी गोरखपुर, फूलपुर तथा कैराना के संसदीय तथा नूरपुर विधानसभा उपचुनावों में भाजपा के खिलाफ मतदान करके जाहिर कर दी।

विधानसभा चुनावों से पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा किसानों की ऋण मुक्ति का वादा करने की वजह से उत्तर प्रदेश में भाजपा की बम्पर जीत हुई। सूबे के किसान चाहते हैं कि उनका सारा ऋण समाप्त किया जाये। यदि ऐसा नहीं किया गया तो किसान भाजपा के खिलाफ मतदान को मजबूर होंगे। यदि सरकार लोकसभा चुनावों से पूर्व किसानों विशेषकर छोटे किसानों के सारे कर्जे माफ करती है तो उसे महागठबंधन नाम मात्र की सीटों पर ही झटका दे सकता है जबकि अधिकांश सीटों पर किसान उसे विजयी बना सकते हैं लेकिन इस बार घोषणा से बात नहीं बनने वाली, वे मतदान से पहले ऋण मुक्ति चाहते हैं।

उधर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने अपने वायदे के मुताबिक दो-दो लाख कर्जा मुक्ति के आदेश कर किसानों में भरोसा कायम किया है।

अखिलेश, मायावती
उत्तर प्रदेश की राजनीति जाति आधारित है। इस बार पिछड़ा, दलित तथा अल्पसंख्यक समुदाय का अधिकांश वोट भाजपा विरोधी महागठबंधन की ओर जाना चाहता है। इन्हीं समुदायों में किसानों की नब्बे फीसदी आबादी है। महागठबंधन यदि किसानों के कर्ज माफी की घोषणा करता है तथा मरता क्या न करता की तर्ज पर कांग्रेस भी यही वायदा करती है तो ये विपक्षी दल किसानों का कर्ज चुनाव से पूर्व माफ नहीं कर सकते तथा बाद का भरोसा भी जरुरी नहीं जबकि भाजपा के पास सत्ता है और उसके पास सरकारी कोष है। ऐसे में वह चुनाव पूर्व कर्ज माफी अमल में ला सकती है। कुल किसानों में 80 फीसदी लघु और सीमांत किसान हैं जिनमें से अधिकतर ऐसे हैं जिनके ऊपर बहुत बड़ी रकम कर्ज की बाकी है।

यह तो भाजपा के रणनीतिकार जानते हैं कि उन्हें क्या करना है? इस पार्टी पर आरएसएस का गहरा प्रभाव है तथा वह उसी की चाल, चरित्र और चेहरे को प्रतिबिम्बित करती है। किसान, नौजवान और मजदूर इससे अब वाकिफ भी हो चुके। अतः किसी हवाई वायदे पर लोग भरोसा नहीं करने वाले। किसानों की कर्ज विमुक्ति चुनाव से पूर्व सरकार कर देगी तो उत्तर प्रदेश के किसान महागठबंधन को भी किनारे लगा देंगे। इस सूबे से ही दिल्ली की सत्ता का मार्ग गुजरता है, यह सभी जानते हैं।

~टाइम्स न्यूज़ लखनऊ.