इस बार कौन होगा प्रधानमंत्री?

कौन होगा प्रधानमंत्री?
आकलन यह संकेत दे रहा है कि कांग्रेस और भाजपा में बहुत ही कांटे का मुकाबला होगा.
इस बार चाहे भाजपा अथवा कांग्रेस केन्द्र में कोई भी दल सबसे बड़ा दल बनकर सामने आये लेकिन अकेला कोई भी दल केन्द्र में सत्ता पाने के बहुमत तक पहुंचना मुश्किल होगा। यह राजनीतिक नब्ज पर पकड़ रखने वालों का मानना है। यह भी चरचा है कि सत्ता यूपीए अथवा एनडीए में से किसी को भी मिले, इस बार प्रधानमंत्री के लिए भी नए चेहरे के सामने आने की पूरी संभावना है। यह भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि 2014 के मुकाबले इस बार भाजपा की सीटें घटेंगी जबकि कांग्रेस की सीटों में भारी इजाफे की संभावना है। इसी के साथ यह आकलन करना आसान नहीं कि दोनों दलों की सीटों में कितनी घटत-बढ़त होगी।

2014 के चुनावों में भाजपा पूरे दमखम और मोदी लहर पर सवार होकर 31 फीसदी मत हासिल कर पायी थी। जबकि वह 282 सीटें प्राप्त करने में सफल रही। इतने कम मत प्रतिशत पर इतनी अधिक सीटें मिलने का मूल कारण विपक्षी दलों का बिखराव था। इस बार अधिकांश राज्यों में चक्र 2014 के विपरीत घूम रहा है। सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा तथा रालोद मुख्य दल अलग-अलग लड़े थे जिसका लाभ प्रत्यक्ष रुप से भाजपा को मिला था। इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा को इससे तगड़ा झटका लगेगा जिसकी दहल उसके केन्द्रीय सिंहासन को हिला कर रख देगी।

दूसरे सबसे अधिक सीटों वाले राज्य महाराष्ट्र में भी पहले शरद पंवार और कांग्रेस आमने-सामने थे जिसका सीधा लाभ भाजपा और शिवसेना को हुआ। यहां भी इस बार उल्टा मामला बन रहा है। कांग्रेस अपने पुराने साथी के साथ मैदान में उतर रही है जिससे दूसरे सबसे बड़े राज्य में भाजपा की हालत पहले से बदतर होगी। उत्तर प्रदेश की 80 और महाराष्ट्र की 48 सीटें मिलकर 128 बैठती हैं जिनमें से भाजपा और उसके साथी मिलकर पिछली बार 115 सीटें ले गये थे। लाख कोशिश के बाद भी ताजा हालातों में यहां भाजपा पचास सीटें पाने की स्थिति में नजर नहीं आती।

2014 में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा हरियाणा जैसे राज्यों की लगभग सभी सीटों को भाजपा जीतने में सफल रही। हरियाणा को छोड़ शेष सभी राज्यों में वह बाद में अपनी सरकारें गंवा चुकी। ऐसे में इन सभी राज्यों में भी भाजपा की सीटें घटनी अनिवार्य हैं। पंजाब में भी कांग्रेस सत्ता में है। वहां भाजपा और अकाली दल गठबंधन की हालत बहुत ही खस्ता है। और तो और प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में भी भाजपा का मत प्रतिशत गिरा है और कांग्रेस का बढ़ा है। यहां 2014 की तरह लाख कोशिश के बावजूद भाजपा लोकसभा की सारी सीटें नहीं जीत पायेगी।

आंध्र, तेलंगाना, उड़ीसा, बंगाल, तमिलनाडु तथा केरल जैसे राज्यों में भाजपा विरोधी ताकतें उसके पैर तक नहीं जमने देना चाहतीं। बंगाल और पूर्वोत्तर में भी वह बहुत कमजोर है। असम, बिहार, उत्तराखंड तथा हिमाचल में यूपीए और एनडीए में कड़ा मुकाबला होगा।

टीवी चैनलों पर आयेदिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी को लेकर लोकप्रियता के जो आंकड़े दिए जा रहे हैं वहीं राहुल की लोकप्रियता में लगातार इजाफा दिखाया जा रहा है, भले ही वह आज भी मोदी से नीचे हैं लेकिन यह भी देखना होगा कि 2004 में अटल बिहारी और सोनिया गांधी की तुलना में यह अंतर काफी कम है। इसके बावजूद वाजपेयी चुनाव हार गये थे।

2019 का आकलन यह संकेत दे रहा है कि कांग्रेस और भाजपा में बहुत ही कांटे का मुकाबला होगा। ऐसे में यदि यह मान भी लिया जाये कि भाजपा सबसे बड़े दल के रुप में सामने आयेगी, तब भी वह बमुश्किल डेढ़ सौ के आसपास सिमट जायेगी। ऐसे में दूसरे दलों से मोल भाव में भाजपा में से कोई सर्वसम्मत नेता प्रधानमंत्री के तौर पर चुनना होगा। ऐसे में जरुरी नहीं कि फिर से नरेन्द्र मोदी को ही इसके लिए चुना जाये।

केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी लगता है समझ गये हैं कि 2019 के परिणाम क्या होने वाले हैं। उनके ताजा बयान कि शीर्ष नेतृत्व यदि जीत का सेहरा बांधता है तो हार की जिम्मेदारी भी लेनी होगी। इसी के साथ विपक्षी नेताओं से मधुर संबंध साधने में उनकी महारत प्रधानमंत्री पद की तैयारी के संकेत नहीं तो और क्या है? भारी बहुमत के बावजूद मंदिर निर्माण पर खामोशी, धारा 370 पर चुप्पी जैसे मामलों पर हिन्दू संगठनों के नेता भी आंतरिक नाराजगी में हैं। थोड़ी कमजोरी के बाद वे सभी पार्टी नेता मुखर हो सकते हैं जो किसी मजबूरी में मुंह बंद किए हुए हैं। कई लोगों का मानना है कि संघ भी हिन्दुत्व को धार देने के लिए मोदी के बजाय योगी आदित्यनाथ को आगे लाना चाहता है। चुनावी सभाओं में योगी का बराबर उपयोग किया जाना इस संभावना की ओर इशारा करता है।

~जी.एस. चाहल.